बुधवार, 10 अगस्त 2022

ग़ज़ल 244

 ग़ज़ल 244 [09E]


2122---2122---2122


वक़्त देता, वक़्त आने पर सज़ा है

कौन इसकी मार से अबतक बचा है 


रात-दिन शहनाइयाँ बजती जहाँ थीं

ख़ाक में ऎवान अब उनका पता है


तू जिसे अपना समझता, है न अपना

आदमी में ’आदमीयत’ लापता है


दिल कहीं, सजदा कहीं, है दर किसी का

यह दिखावा है ,छलावा और क्या है 


इज्तराब-ए-दिल में कितनी तिश्नगी है

वो पस-ए-पर्दा  बख़ूबी जानता है  


क्या कभी ढूँढा है उसको दिल के अन्दर

बारहा ,बाहर जिसे तू  ढूँढता  है


ज़िंदगी क्या है ! न इतना सोच ’आनन’

इशरत-ओ-ग़म से गुज़रता रास्ता है


-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ

ऎवान                = महल , प्रासाद

इज़्तराब-ए-दिल  =बेचैन दिल

तिश्नगी          = प्यास

पस-ए-पर्दा         = परदे के पीछॆ से

बारहा = बार बार 

इशरत-ओ-ग़म से     = सुख -दुख से


ग़ज़ल 243

 ग़ज़ल 243


1222---1222---122---1222


नई जब राह पर तू चल तो नक़्श-ए-पा बना के चल,

क़दम हिम्मत से रखते चल, हमेशा सर उठा के चल ।


बहुत से लोग ऐसे हैं ,जो काँटे ही बिछाते हैं

अगर मुमकिन हो जो तुझसे तो गुलशन को सजा के चल 


डराते है तुझे वो बारहा बन क़ौम के ’लीडर’

अगर ईमान है दिल में तो फिर नज़रें  मिला के चल


किसी का सर क़लम करना, सिखाता कौन है तुझको ?

अँधेरों से निकल कर आ, उजाले में तू आ के चल


तुझे ख़ुद सोचना होगा ग़लत क्या है सही क्या है

फ़रेबी रहनुमाओं से ज़रा दामन बचा के चल


न समझें है ,न समझेंगे , वो अन्धे बन गए क़स्दन

मशाल इन्सानियत की ले क़दम आगे बढ़ा के चल


सफ़र कितना भी हो मुशकिल, लगेगा ख़ुशनुमा ’आनन’

किसी को हमसफ़र, हमराज़ तो अपना बना के चल


-आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ

क़स्दन = जानबूझ कर

ग़ज़ल 242

  ग़ज़ल 242 [07E]


122---122---122---122


कटी उम्र उनको बुलाते बुलाते

जमाना लगेगा उन्हें आते आते


न जाने झिझक कौन सी उनके मन में

इधर आते आते, ठहर क्यों हैं जाते ?


हक़ीक़त है क्या? यह पता चल तो जाता

कभी अपने रुख से वो परदा हटाते


अँधेरों में तुमको नई राह दिखती

चिराग़-ए-मुहब्बत अगर तुम जलाते


परिंदो की क्या ख़ुशनुमा ज़िंदगी है

जहाँ दिल किया जब वहीं उड़ के जाते


ख़िलौना था कच्चा इसे टूटना था

नई बात क्या थी कि आँसू बहाते


ये माना कि दुनिया फ़रेबी है ’आनन’

इसी में है रहना, कहाँ और जाते 


-आनन्द.पाठक-


शनिवार, 11 जून 2022

ग़ज़ल 241

 ग़ज़ल 241

1222---1222---1222--1222

तुम्हारी जालसाजी में उन्हें कुछ तो दिखा होगा

उन्हें कुछ तो सबूतों में, बयानों मे मिला होगा


बिना पूछॆ सफ़ाई में जो चाहे सो कहो, लेकिन

धुआँ बिन आग का होता कहाँ ? तुमको पता होगा


तुम्हीं मुजरिम, तुम्ही मुन्सिफ़, गवाही में खड़े तुम ही

सियासत की है मजबूरी ,तुम्हें करना पड़ा होगा


हमें तुम क्या समझते हो, हमे सच क्या नहीं मालूम?

"हरिशचन्दर’ नहीं हो तुम ,ये तुमको भी पता होगा 


तुम्हारी झूठ की खेती, तुम्हारे झूठ का धन्धा

तुम्हारा "ऎड" टी0वी0 पर निरन्तर चल रहा होगा


वो कह कर तो यही आया 'बदलना है निज़ामत को'

ख़बर क्या थी कि "कुर्सी" के लिए अन्धा हुआ होगा


जहाँ अपनी सफ़ाई में सदाक़त ख़ुद क़सम खाती

समझ लो झूठ की जानिब यक़ीनन फ़ैसला होगा


कहें हम क्या उसे ’आनन’,  मुख़ौटॊं पर मुखौटे हैं

लिए मासूम सा चेहरा वो सबको छल रहा होगा 


-आनन्द.पाठक--
शब्दार्थ

निज़ामत = व्यवस्था

सदाक़त = सच्चाई

पोस्टेड 04-06-22

ग़ज़ल 240

 ग़ज़ल 240 [05E]


221---1222 // 221--1222


दिल ने जो कहा मुझसे,मैं काश ! सुना होता

दुनिया को समझने में धोखा न हुआ होता


करता भी वुज़ू कैसे, मन साफ़ नहीं था जब

दिल और कहीं हो तो, सजदा क्या भला होता


तक़रीर तेरी ज़ाहिद माना कि सही लेकिन

मेरा भी सनम कैसा, मुझसे भी सुना होता


कूचे से तेरे गुज़रे,  याद आए गुनह मेरे

दिल साफ़ रहा होता ,नादिम न हुआ होता


आग़ाज़-ए-मुहब्बत का होता है मुहूरत क्या

शिद्दत से कभी तुमने आग़ाज़ किया होता


औरों की तरह तुमने अपना न मुझे समझा

जो बात दबी दिल में ,मुझसे तो कहा होता


दुनिया के मसाइल में, उलझा ही रहा ’आनन’

फ़ुरसत जो मिली होती, दर तेरे गया होता ।


-आनन्द.पाठक-

वुज़ू  = नमाज़ के पहले शुद्ध होना

तक़रीर  = प्रवचन

आग़ाज़   = शुरुआत

मसाइल  = मसले