मंगलवार, 31 अगस्त 2021

अनुभूतियाँ 100

 क़िस्त 100


397

जिस दिन ज्वार उठेगा मन में

साहिल तक लहरें आएँगी

चुपके चुपके दिल की बातें

साहिल से कह कर जाएँगी


398

जो बीता, सो बीत गया अब

ग़लत-सही की बातें छोड़ो

कुछ ख़ूबी मुझमे दिख जाती

तुम जो अगर यूँ मुँह ना मोड़ो


399

अपनी मरजी की मालिक तुम

इस पर मैं क्या कह सकता हूँ

अगर लिखी होगी तनहाई

तनहा भी मैं रह सकता  हूँ


400

’अनुभूति’ यह नई नहीं  है

हर मन की यह एक व्यथा है

सूरज उगने से ढलने तक

सुख-दु:ख की यह एक कथा है


-आनन्द.पाठक-


--00--00--00--00-

समाप्त


अनुभूतियाँ 99

 किस्त 99


393

इतना तो मालूम नहीं है

खुशियाँ कब आतीं ,कब जातीं

लेकिन मेरी तनहाई में

यादें तेरी साथ निभातीं


394 

कैसे हाथ बढ़ाते तुम तक

हाथ हमारे कटे हुए थे

वक़्त के हाथों कौन बचा है

हम अन्दर से बँटे हुए थे


395

एक द्वन्द चलता रहता है

आजीवन इस मन के अन्दर

पाप-पुण्य क्या, ग़लत-सही क्या 

मन उलझा रहता जीवन भर


396

किसको ढूँढ रहा हूँ मैं ,क्यों ?

जिसको ढूँढ न पाए ग्यानी

लेकिन सब की प्यास एक है

सदियों की ,जानी पहचानी

-आनन्द.पाठक-

अनुभूतियाँ 98

 क़िस्त 98


389

जीवन भर चलता रहता है

एक तमाशा मेरे आगे

आ जाती है नींद किसी को

कोई कहीं सुबह में जागे


390

क़तरे से है बना समन्दर

या कि समन्दर में भी क़तरा 

एक दिवस जब मिल जाना है

फिर क्यों है जिस्म का पहरा


391

आँख मिचौली सुख-दु:ख की है

हार-जीत का बस खेला है

जीवन क्या है ? आना-जाना

चार दिनों का बस  मेला  है 


392

ग़म के पल में ही पलते हैं

आने वाले कल के सपने

साथ पता भी चल जाता

कौन पराया ,कौन हैं अपने

-आनन्द.पाठक-


अनुभूतियाँ 97

 


क़िस्त 97


385

धुआँ भर गया है कमरे में 

खोल खिड़कियाँ दरवाजे सब

वरना घुट-घुट मर जायेगा

नई हवाएँ आने दे अब 


386

याद नहीं अब कुछ रहता है

सुबह हुई या शाम हुई है

कौन गया है, कौन आया है

हस्ती किसके नाम हुई है


387

ख़ामोशी में कौन छुपा है

आँखों से बोला करता है

दर्द तुम्हारा तुम से पहले

आँसू में घोला करता है


388

इश्क़ हक़ीक़ी, इश्क़ मजाज़ी

एक इश्क़ के पहलू दो हैं

फ़र्क़ नहीं फिर रह जाता है

एक जगह जब मिलते वो हैं


-आनन्द.पाठक-


अनुभूतियाँ 96

 


क़िस्त 96


381

अन्तर्मन से अन्तर्मन का 

जब अटूट हो जाए बंधन

गौण उधर तब हो जाता है

रूप-राशि तन का आकर्षन


382

मैं न रहूँ जब  साथ तुम्हारे 

रुकना नहीं सफ़र में अपने

धीरज रख कर पूरी करना

हम दोनों के जो थे सपने


383

जीवन क्या ? संघर्ष कथा है 

दीप-शिखा की, तूफ़ानों से

दुनिया तुम को पहचानेगी

ज्योति-पुंज के अभियानों से


384

धीरे-धीरे आखिर हम-तुम

इतनी दूर चले ही आए

अब तुम कहती लौट मैं जाऊँ

नामुमकिन है क्या बतलाएँ

-आनन्द.पाठक-

अनुभूतियाँ 95

 क़िस्त 95

 

377

खुशबू भला कहँ बँध सकती

कलियों फूलों के बंधन में 

पंख हवाओं के मिल जाते

छा जाती गुलशन गुलशन में


378

चाहत नहीं मरा करती है

एक तेरे ठुकराने भर से

साँस साँस में घुली हुई है

अगर देख लो खुली नज़र से


379

एक प्रश्न पूछा था तुमने

दे सका न मैं जिसका उत्तर

कितना ढूँढा पोथी-पतरा

उत्तर था बस " ढाई-आखर’ 


380

सार यही जीवन का समझो

निश्चल पावन प्रेम समर्पन

पोथी-पतरा क्या जानूँ मै

जानूँ एक यही बस ’दर्शन’

-आनन्द.पाठक-

अनुभूतियाँ 94

 


क़िस्त 94


373

जबतक है चेतना तुम्हारी

तबतक इसको थाती समझो

साँस है जबतक तुम भी तबतक

वरना फिर तो माटी समझो


374

जबतक सूरज चमक रहा है

जो करना है कर जाना  है

शाम ढलेगी तो फिर सबको

अपने अपने घर जाना है


375

"अनुभूति" न बस ’आनन’ की है

मेरी-तेरी हम सबकी है

फ़र्क यही कि मैने कह दी

और सभी ने बस सह ली है


376

रात गई सो बात गई अब

उसको फिर से क्या दुहराना

नई सुबह की नई किरन को

जो बीती है नहीं बताना 

-आनन्द.पाठक-


अनुभूतियाँ 93

 क़िस्त 93


369

प्यास अधूरी रह जाती है

दुनिया भर के बंधन-साँकल

कभी इधर है धरती प्यासी

कभी उधर है प्यासा बादल


370

बैठे ठाले लिख देते हो

मेरे सर इलजाम लगा कर

रत्ती भर था दोष न मेरा

किसे कहूँ मै रो कर-गा कर


371

जीवन की आपा-धापी में

इतना वक़्त नहीं मिल पाया

ख़ुद से ख़ुद भी निल न सका मैं

हासिल भी लाहासिल पाया


372

केन्द्र-परिधि का रिश्ता है जो

ठीक वही रिश्ता गोरी का

दूर दिखे पर दूर नहीं वो

एक छोर है उस डोरी का


-आनन्द.पाठक-


अनुभूतियाँ 92

 


क़िस्त 92


365

तर्क तुम्हारा अपना होगा

मेरी सफ़ाई कम तो नहीं थी

बात नहीं जब सुनना तुमकॊ

वरना दुहाई कम तो नहीं थी


366

एक कल्पना या कि हक़ीक़त

कौन थी वह ? मालूम नहीं है

लेकिन इतना पता है मुझको

वह इतनी मासूम नहीं है 


367

ख़्वाब था या कि ख़्वाब नहीं था

मैने देखा नहीं नज़र भर

कौन थी वह> मैं पागल होकर

ढूँढ रहा जिसको जीवन भर


368

माँगा था तुम ने कुछ मुझसे

मैं ही था कुछ दे न सका था

शुष्क रेत की एक नदी थी

खेना चाहा खे न सका था 


अनुभूतियाँ 91

 क़िस्त 91


361

सन्दल सा है बदन तुम्हारा

छू कर आती हुईं हवाएँ

एक नशा सा भर देती हैं

और न हम फिर होश में आएँ

 

362

राह न रोकूँ ,हट जाऊँ मैं

अगर यही याचना तुम्हारी

और दुआ मैं क्या कर सकता 

पूरी हो कामना तुम्हारी


363

एक परीक्षा यह भी बाक़ी

गली तुम्हारी ,मुझे गुज़रना

पार हुए तो फिर जीना है

वरना मरने से क्या डरना


364

आ न सकूँगा द्वार तुम्हारे

यह न समझना प्यार नहीं है

तन मेरा हो भले कहीं भी

मन मेरा पर टिका वहीं है

-आनन्द.पाठक-


अनुभूतियाँ 90

 


क़िस्त 90


357

पता तुम्हारा सबको मालूम

योगी-भोगी या सन्यासी 

वो भी लेकिन भटक रहे हैं

मन्दिर मन्दिर मथुरा-काशी


358

सावन की बदली जैसी तुम

जाने किधर किधर से उमड़ी

एक मेरा मन छोड़ के प्यासा

जाने किधर किध्र को बरसी


359

आसमान से उतर चाँदनी

करने आई सैर चमन की

जाते जाते पूछ रही थी

लेकर गई पता ’आनन’ की


360

कली कली में फूल फूल में 

गन्ध तुम्हारी समा रही थॊ 

पत्ते पत्ते की खुशबू ही

पता तुम्हारा बता रही थी

-आनन्द.पाठक-

अनुभूतियाँ 89

 

क़िस्त 89

 

353

धीरे धीरे छोड़ गए सब

एक तुम्ही से आस लगी है

तुम भी अब जाने को कहती

एक आख़िरी साँस बची है

 

354

प्रश्न तुम्हारा वहीं खड़ा है

मैं ही उत्तर ढूँढ न पाया

ग्यान-ध्यान क्या दर्शन क्या है

मैं ही मूढ़ समझ ना पाया

 

 

 

355

मेरी नहीं तो अपने दिल की

कभी कभी तो बातें सुन लो

सत्य-झूठ की राहें सम्मुख

जो चाहे तुम राहें चुन लो

 

356

सत्ता उसकॊ नूर उसी का

जड़-चेतन में वही समाया

यह तो अपनी अपनी क़िस्मत

किसने खोया किसने पाया


-आनन्द.पाठक-

 

अनुभूतियाँ 88

 क़िस्त 88


349

सच की करें हिमायत खुल कर 

कहाँ गए वो करने वाले

कहीं नहीं अब दिखते हैं वो

उलफ़त में थे मरने वाले


350

धीरे धीरे छोड़ गए सब

एक तुम्हारी आस बची थी

तुम भी अब जाने को कहती

जो कि आख़िरी साँस बची थी


351

जाते जाते ख़त ले जाना

लिखा तुम्हे था भेज न पाया

सोचा था अब कुछ न लिखूँगा

लेकिन दर्द सहेज न पाया


352

एक ’कल्पना’ एक ’प्रेरणा’

कौन बसी थी ?ज्ञात नहीं है

जीवन भर की "अनुभूति" थी 

पल-दो पल की बात नहीं है 

-आनन्द,पाठक-


शुक्रवार, 20 अगस्त 2021

अनुभूतियाँ 87

क़िस्त 87 

345

तुमने ही खो दिया भरोसा

वरना मेरी क्या  ग़लती थी

चाँद उछल कर छू लेने की

शायद तुम को ही जल्दी थी 


346

जा ही रही हो तो जाओ फिर

आँसू का क्या ,कब रुक पाते

कभी कभी भूले भटके भी

मिलते रहना आते-जाते 


347

मन के अन्दर अगर ख़ुशी हो

हर मौसम है हरा-भरा सा

वरना पतझड़ की आहट से 

पत्ता-पत्ता डरा-डरा सा


348

कितना था विश्वास तुम्हारा

माँगा था कुछ हम से हक़ से

एक हमीं थे ,’हाँ’ न कर सके

तुमको उस दिन मैने झट से 


अनुभूतियाँ 86

 क़िस्त 86


341

देख तेरी तसवीर न जाने 

दिल को क्या क्या हो जाता है

पागल सा कुछ बातें करता

किस दुनिया में खो जाता है


342

छोटी-मोटी कमियाँ सब में

कुछ ना कुछ तो शामिल होती

मनुज मनुज है ,देव नहीं है

हस्ती किसकी कामिल होती


343

नदिया जबतक मर्यादा में 

बँध कर बहती, मन भावन है

तोड़ अगर तट्बन्ध बहे तो 

कर देती फिर जल-प्लावन है


344

मर्यादा के अन्दर रहना 

कितना सुखद भला लगता है

वरना तो हर शख़्स यहाँ पर

विष से जला बुझा लगता है


अनुभूतियाँ 85

 क़िस्त 85


337

हँस कर जीना एक कला है

रो-रो कर भी जीना क्यों है

छोटी छोटी बातों पर भी

निश-दिन विष का पीना क्यों है 


338

बन्द खिड़कियाँ खोलो मन की

आने दो कुछ नई हवाएँ

बन्द अँधेरे कमरों में हम 

आशाओं के दीप जलाएँ 


339

मन के अन्दर प्रेम का अमरित

मन के अन्दर विष नफ़रत का

निर्णय तुमको लेना होगा 

ग़लत सही अपनी चाहत का


340

बेमतलब सब बात करेंगे
दुनिया से उम्मीद न करना
अपने दुख ही साथ रहेगा
अपना दुख ही खुद है सहना

-आनन्द.पाठक-


अनुभूतियाँ 84

 


क़िस्त 84


333

मन से उतर गया हो कोई

अब उनकी क्या बातें करना

सीखा कभी नहीं हो जिसने

वादों पर भी खरा उतरना


334

पास अगर आ कर बैठे तो

अपनी अपनी कह लें सुन लें

वक़्त मिला है पल-दो पल का

आज नए कुछ सपने बुन लें


335

नज़रों से गिर जाए कोई

दिल में पुन: उतरता कब है 

टूट भले ही जाता दिल हो

लेकिन भला बिखरता कब है 


336

साहिल का लहरों से मिलना

तुम ने क्यों कमजोरी समझा

लहरों को आलिंगन करना

तुम ने क्यों बरजोरी समझा


-आनन्द.पाठक-

अनुभूतियाँ 83

 क़िस्त 83

329

भौगोलिक सीमाओं में कब

बँध पाया है प्यार किसी का

जिसने बनाया हमको, तुमको

यह भी है उपहार उसी का


330

एक तुम्हारा चेहरा ही है

राह दिखाता रहता मुझको

चाहे जितनी भी दुष्कर हो

साथ निभाता रहता----


331

जो कहना है सीधे कह दो

इधर उधर की बातें क्या फिर

दिल जब पत्थर सा हो जाए 

सुखद-दुखद सौगातें क्या फिर


332

डाल डाल पर उड़ उड़ बैठूँ

ऐसा नहीं परिंदा हूँ मैं

एक डाल पर जीना मरना

इसी बात पर ज़िंदा हूँ  मैं


-आनन्द.पाठक-

अनुभूतियाँ 82

 क़िस्त 82


325

साथ  निभाया नहीं अगर तो

साथ नहीं भी छोड़ा तुम ने

नहीं जुड़ सके हम तुम तो क्या

दिल भी तो ना तोड़ा तुम ने


326

 ज्ञानीध्यानी क्या समझेंगे

"ढाई-आखर" की ताकत को

ऊधौ जी भी कब  समझे थे

गोपी की निर्मल चाहत को


327

चन्दन-वन की ख़ुशबू वाली

छू कर हवा गुज़र जाती है

बीते दिन की याद तुम्हारी

तन में सिहरन भर जाती है


328

प्यासा चातक, प्यासा बादल

और मछलियाँ जल में प्यासी

प्यासी नदिया ,प्यासी धरती

क्या शाश्वत है प्यास हमारी

-आनन्द.पाठक-

अनुभूतियाँ 81

 क़िस्त 81


321

क्या मुझको मालूम नहीं है

दर्द छुपा हँसती रहती हो

जाने ऐसी अगन कौन सी

निश-दिन तुम जलती रहती हो


322

जो भी कमाया प्यार में मैने

दर्द मेरा मेरी थाती है

सुख के दिन कितने दिन तक

दुख तो आजीवन साथी है


323

जिसको चाहा हुई न मेरी

और किसी की भी न हुई तुम

लेकिन मैं महसूस कर रहा

मुझको छू कर गुज़र रही तुम


324

सबकी अपनी अपनी मंज़िल

सबकी अपनी दुनियादारी

सबके अपने अपने बंधन

सबकी अपनी है लाचारी


अनुभूतियाँ 80

 क़िस्त 80


317

कल तक वो जो दम भरती थी

जिसकी दुआओं में था शामिल

आज उसी की नज़रॊ में हूँ 

नाक़िस मैं, नाक़ाबिल यह दिल


318

दुनिया को लगता है शायद

झूठे सब किस्से होते हैं

प्यार वफ़ा तनहाई लेकिन

जीवन के हिस्से होते हैं ।


319

कैसे हाथ बढ़ाते तुम तक

हाथ हमारे कटे हुए थे

वक़्त के हाथों कौन बचा है

हम पहले से लुटे हुए थे


320

जब से रूठ गई तुम मुझसे

रूठ गया ज्यों चाँद गगन से

नहीं बहारें अब आती हैं

जैसे खुशबू गई चमन से

-आनन्द पाठक-

अनुभूतियाँ 79

 क़िस्त 79


313

कलियाँ हँसती चमन महकता

फ़स्ल-ए-गुल का आना-जाना

कब तक जाने उनका होगा

भूले से इस दिल में आना


314

साहिल पर बैठे बैठे क्या

सोच रही हो तनहाई  में

मोती लेकर ही निकलोगी

उतरॊगी जब गहराई में 


315

ये तेरी ख़ामोशी क्यों है

कुछ तो बोल ,बता कर जाती

कोई ख़बर नहीं मिलती है

साँस अटकती जाती- आती ?


316

तुमने सुनाई जो भी कहानी

’सच ही होगा’ - मान लिया था

लेकिन क्या मालूम कि तुमने

झूठ सुना, सच नाम दिया था


-आनन्द.पाठक-


अनुभूतियाँ 78

क़िस्त 78

309

निश्छल तुम भी ,निश्छल मैं भी 

लेकिन कुछ है दुनियादारी

एक ज़रूरत बन जाती है 

कुछ बातों की पर्दादारी


310

नादाँ है ,दीवाना है वह

दुनिया उसको कहती पागल

प्यास बुझाता है धरती की

ख़ुद ही प्यासा रहता बादल


311

ना मैं राजा ,ना तुम रानी

पर दोनो की एक कहानी

आँख तुम्हारी भी नम रहती

आँख मेरी भी भर भर आनी


312

परबत घाटी सहरा सहरा

नदिया बहती रही निरन्तर

हँसती रहती ऊपर ऊपर

प्यास छुपा कर दिल के अन्दर


-आनन्द.पाठक-

 

अनुभूतिया 77

 क़िस्त 77


305

चाँद कहीं हो, कहीं चाँदनी

ऐसा होना क्या है मुमकिन ?

दोनॊ के संबंध अमर हैं

फ़ूल कहाँ होते ख़ुश्बू बिन  ?


306

जीवन है तो आएँगे ही

आँधी तूफ़ाँ झंझावातें

कभी अँधेरा भी उतरेगा

कभी चाँदनीवाली रातें 


307

एक बार जो तुम आ जाओ

ग़म के  अँधियारे मिट जाएँ

नई सुबह में गीत प्रेम के 

हम तुम दोनॊं मिल कर गाएँ


308

कब तक बीती बातॊं को तुम

बोझ लिए दिल पर ढोऒगी ?

वक़्त अभी है पास तुम्हारे

आगे की तुम कब सोचेगी ?

-आनन्द.पाठक-


मंगलवार, 3 अगस्त 2021

अनुभूतियाँ 76

 क़िस्त 76

301

एक तमन्ना थी बस दिल में

साथ साथ जो चलते हम तुम

सफ़र हमारा भी कट जाता

और न रहता दिल यह गुमसुम


302

बात भले हो छोटी लेकिन

चुभ जाती जब दिल के अन्दर

टीस हमेशा देती रहती

जाने अनजाने जीवन भर


303

मीठी मीठी यादों की उन

गलियों में अब फिर क्या जाना

छोड़ के जब मैं आ ही गया तो

सपनों से क्या दिल बहलाना


304

सावन आया ,बादल आए

नहीं सँदेशा कोई लाए

क्या क्या तुम पर गुज़री होगी

सोच ,जिया रह रह घबराए


-आनन्द.पाठक-


अनुभूतियाँ 75

 क़िस्त 75

 297

जीवन क्या है ? ख़ुद ना समझा

लेकिन लाख  शिकायत उससे

सफ़र अकेला कैसे कटता

अगर न होती उलफ़त उससे


298

बात ’अना’ की करते रहते

कभी निकल कर  बाहर आओ

फिर देखो दुनिया कैसी है

सब की नज़रों में छ जाओ


299

व्यर्थ बह्स क्या करना इस पर

किसने किसको छोड़ा पहले

बात वहीं फिर लौट के आती 

किसने दिल को तोड़ा पहले


300

बात नहीं मानोगी मेरी

वही पुरानी जिद,अड़ जाना

छोटी छोटी बातों पर भी

बिना बात मुझ से लड़ जाना

-आनन्द.पाठक-

अनुभूतियाँ 74

 क़िस्त 74 


293

मौन मुखर हो जाता मन का

भोली सूरत में फँस जाता

हमदम बन कर आता कोई

और अचानक है डँस जाता 


294


 सफ़र नहीं कोई नामुमकिन 

हिम्मत क़ायम जब तक दिल में

अगर कभी लगता हो तुमको

याद करो रब को मुश्किल में


295

बादल की है चाल फ़रेबी

उमड़ा यहाँ, कहीं जा बरसा

राह देखती प्यासी गोरी

और भीगने को मन तरसा


296

आँखें सब कुछ कह देती हैं

चाहत चाहे लाख छुपाओ

बिना दिखाए दिख जाता है

दर्द दिखाओ या न दिखाओ 

-आनन्द.पाठक-

अनुभूतियाँ 73

 क़िस्त 73


289

परबत परबत सहरा सहरा

नदिया अविरल बहती जाती

दुनिया से बेपरवा हो कर

अपनी धुन में हँसति गाती


290

बीती बातॊं में क्या रख्खा 

जिसको तुम दुहराती रहती

आगे की सुधि लेना बेहतर

माज़ी में क्यॊ जाती रहती ?


291

दुनिया की अपनी गाथा है

और तुम्हारी अलग कहानी

कौन सदा सुख में रहता है

बात नहीं क्यॊ तुम ने जानी


292

औरों को उपदेश सरल है

जब तक अपने पर ना आए

प्रवचन करना अलग बात है

उस पर जीना किसको भाए

-आनन्द.पाठक-

अनुभूतियाँ 72

 क़िस्त 72


285

बादल बरसे या ना बरसे

कोई असर नहीं अब मुझ पर

प्रेम-प्रीति का स्नेह नहीं जब

दीप जलेगा फिर क्या बुझ कर


286

हमदम बन कर छला सभी ने

फिर भी नहीं शिकायत कोई

दुआ सभी को दिल से मेरा

जो होना है होगा वो ही


287

’कथनी’ कुछ थी ,’करनी’ कुछ थी

चेहरे पर चेहरे थे उन पर

वीर बहादुर बातों के थे

क्या करते हम उनको सुन कर


288

पथरीली राहों से चल कर

सागर से मिलने जब आई 

प्यास मिलन की लेकर नदिया

नाप रही अपनी गहराई

-आनन्द.पाठक--


अनुभूतियाँ 71

 क़िस्त 71

281

दर्द बाँटने से, सुनते हैं

मन कुछ हल्का हो जाता है

जख़्म भले जितना गहरा हो

भर कर अच्छा हो जाता है 


282

ऐसी क्या है बात कि जिसको

दुनिया से तुम छुपा रही हो

आँखें सब कुछ कह देती हैं

याद किसी की भुला रही हो


283

तूफ़ाँ में थी कश्ती मेरी 

क्या क्या गुज़री थी इस दिल पर

तुम ने भी तो देखा होगा

और हँस रहे थे साहिल पर


284

सबका अपना दिन होता है

सबकी काली रातें होती

प्यार वफ़ा सब क़स्में वादे

कहने की बस बातें होतीं

-आनन्द.पाठक-


अनुभूतियाँ 70

 क़िस्त 70

277

बात यहाँ की, या कि वहाँ की

बातों में तू शामिल होगा

साँस बाँध कर दौड़ रहा है 

सोच ज़रा क्या हासिल होगा ?


278

नदिया अविरल बहती रहती

नहीं देखती पीछे मुड़ कर

एक कल्पना में जीती है

आनन्दित सागर से जुड़ कर 


279

बात नई वैसे तो नहीं कुछ

पीड़ा है जानी पहचानी

पास जो बैठो,कह लें,सुन लें

अपनी अपनी राम कहानी


280

हाथ मिलाना, मिल कर रहना

कोई मुश्किल काम नहीं है

लेकिन अहं गुरुर आप का

बन जाती दीवार वहीं है 

-आनन्द.पाठक-


अनुभूतियाँ 69

 क़िस्त 69


273
साथ सफ़र में कितने आए
धीरे-धीरे दूर हो गए
हम सब हैं कठपुतली उसकी
नर्तन को मजबूर हो गए ।


274
सावन फिर आने वाला है
और अभी तक तुम हो रूठी
"हाँ" कह कर फिर भी ना आना
क्यॊं न कहूँ मैं तुम हो झूठी


275
"मेघदूत" का नहीं जमाना
जो कहना है ’मेसेज’ कर दो
और कोई इल्जाम हो बाक़ी
वह भी मेरे सर पर धर दो


276
जब तुमने यह मान लिया है
मैं ही ग़लत था,तुम ही सही थी
तिल का तुमने ताड़ बनाया
बात जो मैने कही नहीं थी

-आनन्द.पाठक-

सोमवार, 2 अगस्त 2021

ग़ज़ल 191

 2122---1212--112

ग़ज़ल 191 : चाह अपनी छुपा न सके--


चाह अपनी कभी छुपा न सके
बात दिल की ज़ुबाँ पे ला न सके

आँख उनकी कही न भर आए
ज़ख़्म दिल का उन्हे दिखा न सके

सामने यक ब यक जो आए वो
शर्म से हम नज़र मिला न  सके

कैसे करता यक़ीन मैं तुम पर
एक वादा तो तुम निभा न सके

ज़िन्दगी के हसीन पहलू को
एक हम हैं कि आजमा न सके

लोग इलजाम धर गए मुझ पर
हम सफ़ाई में कुछ बता न सके

याद क्या हम को आ गया ’आनन’
हम नदामत से आँख उठा न सके 

-आनन्द पाठक-

ग़ज़ल 190

 221--1222 // 221--1222


ग़ज़ल 190


बगुलों की मछलियों से, साजिश में रफ़ाक़त है
कश्ती को डुबाने की, साहिल की  इशारत  है

वो हाथ मिलाता है, रिश्तों को जगा कर के
ख़ंज़र भी चुभाता है , यह कैसी शरारत है

शीरी है ज़ुबां उसकी , क्या दिल में, ख़ुदा जाने 
हर बात में नुक़्ता चीं ,उसकी तो ये आदत है

जब दर्द उठा करता, दिल तोड़ के अन्दर से
इक बूँद भी आँसू की कह देती हिकायत है

इकरार नहीं करते ,’हां’ भी तो नहीं कहते
दिल तोड़ने वालों से, क्या क्या न शिकायत है

अब कोई नहीं मेरा, सब नाम के रिश्ते हैं
हस्ती से मेरी अपनी ताउम्र बग़ावत है

इक राह नहीं तो क्या ,सौ राह तेरे आगे
चलना है तुझे ’आनन’ कोई न रिआयत है

=आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ

रफ़ाक़त = दोस्ती, सहभागिता

हिकायत = कथा-कहानी ,वृतान्त

रिआयत = छूट 



ग़ज़ल 189

 1222---1222----1222----1222

ग़ज़ल 189

जो रंग अस्ल है वो दिखाएगा एक दिन

वो सरफ़िरा है होश में आएगा  एक दिन


नफ़रत के शह्र में भरा बारूद का धुआँ

पैग़ाम-ए-इश्क़ कोई सुनायेगा एक दिन


कुछ लोग हैं कि अम्न के दुश्मन बने हुए

यह वक़्त उनको खुद ही मिटाएगा एक दिन


किस बात पर गुरूर है ,किस बात का नशा

सब कुछ यहीं तू छोड़ के जाएगा एक दिन


हम तो इसी उमीद में करते रहे वफ़ा

वह भी वफ़ा का फ़र्ज़ निभाएगा एक दिन


वैसे हज़ार बार वो इनकार कर चुका

आने को कह गया है तो आएगा एक दिन


’आनन’ उमीद रख अभी आदम के हुनर पर

सूरज उतार कर यही लाएगा एक दिन


-आनन्द,पाठक-