शनिवार, 2 मार्च 2024

ग़ज़ल 355

  


ग़ज़ल 355/30


221---2122  // 221-2122


दिल का बयान करते ये आइने ग़ज़ल के

माजी के है मुशाहिद, नाज़िर हैं आजकल के


एहसास-ए-ज़िंदगी हूँ, जज़्बा भी हूँ, ग़ज़ल हूँ

हर दौर में हूँ निखरी, अहल-ए-ज़ुबाँ में ढल के


अन्दाज़-ए-गुफ़्तगू है नाज़-ओ-नियाज़ भी है

तहज़ीब ,सादगी भी आदाब हैं ग़ज़ल के 


आती समझ में उसको कब रोशनी की बातें

वो तीरगी से बाहर आता नही निकल के ।


सीने की आग से जो ये खूँ उबल रहा है 

इन बाजुओं से रख दे दुनिया का रुख़ बदल के


हर बार ख़ुद ही जल कर देती सबूत शम्मा’

उलफ़त के ये नताइज़ कहती पिघल पिघल के


जंग-ओ-जदल से कुछ भी हासिल न होगा’आनन’ 

पैग़ाम-ए-इश्क़ सबको मिलकर सुनाएँ चल के ।


-आनन्द.पाठक-


नताइज़ = नतीज़े

मुशाहिद,नाज़िर = प्रेक्षक, observer,गवाह

जंग ओ जदल = लड़ाई झगड़ा युद्ध

ग़ज़ल 354

  


ग़ज़ल 354/29

212---212---212---212--// 212--212--212--212


मैने तुम से कभी कुछ कहा ही नहीं , बेनियाज़ी का ये सिलसिला किसलिए ?

तुमने जो भी कहा मैने माना सभी , फिर भी रहती हो मुझसे ख़फ़ा किसलिए ?


उम्र भर मै तुम्हारा रहा मुन्तज़िर, राह देखा किए आख़िरी साँस तक ,

आजमाना ही था जब मुझे ऎ सनम !बारहा फिर इशारा किया किसलिए।


जानता हूँ न आना, न आओगी तुम, सौ बहानों से वाक़िफ़ रहा मेरा दिल

क्या करें दिल है नादान समझा नहीं,उम्र भर राह देखा किया किसलिए ।


जानता हूँ तुम्हारी ये मजबूरियाँचाह कर भी न तुम कुछ भी कह पाओगी

इस जमाने का यह कौन सा है करम हाथ में ले के पत्थर खड़ा किसलिए ।


क्या छुपा है जो तुमसे छुपाऊँगा मैं और क्या है जो तुमको न मालूम हो

इक भरम का था परदा रहा उम्र भर, सच उसे मानता मैं रहा किसलिए ?


ज़िंदगी का सफ़र इतना आसाँ नहीं , हर क़दम दर क़दम पर मिले पेच-ओ-ख़म

जो मिला है उसे ही नियति मान लें, जो न हासिल उसे सोचना किसलिए !


तुम रफ़ीक़ों की बातों में फिर आ गई,कान भरना था उनको , भरे चल दिए

तुमने मेरी सफ़ाई सुनी ही कहाँ , बिन सुने ही दिया फिर सज़ा  किसलिए ?


उसकी मुट्ठी खुली तो दिखी, खाक थी, कहते थकता नहीं था कि है लाख की

क्या हक़ीक़त थी सबको तो मालूम था,वह मुख़ौटे चढ़ाए रहा किसलिए ?


तुम भी ’आनन’ कहाँ किस ज़माने के हो, कौन मिलता यहाँ बेसबब बेग़रज़

जिसको समझा किया उम्र भर मोतबर, फेर कर मुंह वही चल दिया किसलिए ?


-आनन्द.पाठक-

मुन्तज़िर = प्रतीक्षक

बारहा = बार बार

मोतबर = विश्वसनीय

ग़ज़ल 353

 



ग़ज़ल 353 [28]

2122---2122---212


ज़िंदगी का फ़लसफ़ा कुछ और है

आदमी का सोचना कुछ  और है ।


बात वाइज़ की सही अपनी जगह

दर हक़ीकत सामना कुछ और है ।


तुम भले ही जो कहो, हँस कर कहो

जर्द चेहरा कह रहा कुछ  और है।


क्यों तुम्हे दिखता नहीं चेहरे का सच

क्या तुम्हारा आइना कुछ और है ?


दिल कहे जब भी कहे तो सच कहे

लग रहा तुमने सुना कुछ और है ।


वस्ल के पहले ख़याल-ए-वस्ल हो

फिर तड़पने का मज़ा कुछ और है।


प्रेम का मतलब नहीं 'आनन' हवस

प्रेम का तो रास्ता कुछ और है ।


-आनन्द.पाठक-


ग़ज़ल 352

  


ग़ज़ल 352 

1212---1122---1212---22


नहीं वो बात रही, क्या करूँ गिला कोई,

तेरे ख़याल में अब और आ गया  कोई ।


मिले जो आज तलक सबकी थी गरज अपनी

गले लगा ले जो मुझको,नहीं मिला कोई ।


दयार आप का हो या दयार-ए-यार कहीं ,

निगाह-ए-पाक ने कब फर्क है किया कोई !


करम हो आप का जिस पर वो ख़ुश रहा, वरना

अजाब-ए-सख़्त के कब तक यहाँ बचा कोई ।


ज़ुबान बेच दी जिसने खनकते सिक्कों पर

गिरा जो ख़ुद की नज़र से न उठ सका कोई ।


कहाँ कहाँ से न गुज़रे तलाश-ए-हक़ में, हम

सही मुक़ाम न अबतक कहीं मिला कोई ।


सफ़र हयात का अब ख़त्म हो रहा ’आनन’

क्षितिज के पार से मुझको बुला रहा कोई ।


-आनन्द.पाठक-

ग़ज़ल 351

  ग़ज़ल 351[26]


1222---1222----1222---1222


न मिलते आप से जो हम तो दिल बहका नही होता

अगर हम होश में आते, तो ये अच्छा नहीं होता


तुम्हारे हुस्न के दीदार की होती तलब किसको,

तजल्ली ख़ास पर इक राज़ का परदा नहीं होता ।


असर मे आ ही जाते हम, जो वाइज के दलाइल थे

अगर इस दरमियाँ इक मैकदा आया नहीं होता ।


कभी जब फ़ैसला करना, समझ कर, सोच कर करना

कि जज़्बे से किया हो फ़ैसला , अच्छा नहीं होता ।


अगर दिल साफ़ होता, सोच होता आरिफ़ाना तो 

तुम्हे फिर ढूँढने में मन मेरा भटका नहीं होता ।


नवाज़िश आप की हो तो समन्दर क्या. कि तूफ़ाँ क्या

करम हो आप का तो ख़ौफ़ का साया नहीं होता ।


दिखावे  में ही तूने काट दी यह ज़िंदगी ’आनन’

तू अपने आप की जानिब से क्यों सच्चा नहीं होता ।



-आनन्द.पाठक-



 


शुक्रवार, 1 मार्च 2024

ग़ज़ल 350

 ग़ज़ल 350

1222---1222---1222---1222


चुनावों का ये मौसम,है  तुझे सपने दिखाएगा

घिसे नारे पिटे वादे, वही फिर से सुनाएगा ।


थमा कर झुनझुना हमको, हमें बहला रहा कब से

सभी घर में है ख़ुशहाली, वो टी0वी0 पर दिखाएगा


सजा कर आँकड़े संकल्प पत्रों में हमे देगा

वो अपनी पीठ अपने आप ख़ुद ही थपथाएगा ।


किनारे पर खड़े होकर नसीहत करना आसाँ है

उतर कर आ समन्दर में , नसीहत भूल जाएगा


इधर टूटे हुए चप्पू , उधर दर्या है तूफानी

हुई अब  नाव भी जर्जर, तू कैसे पार पाएगा ?


सभी अपने घरों में बन्द हो अपना ही सोचेंगे

लगेगी आग बस्ती में ,बुझाने कौन आएगा ।


किसी की अन्धभक्ति में चलेगा बन्द कर आँखें

गिरेगा तू अगर ;आनन; ग़लत किसको बताएगा 


-आनन्द.पाठक-



ग़ज़ल 349

 ग़ज़ल 349 [24]


1222---1222---122


चिराग़ों की हवाओं से ठनी है

मगर कब रोशनी इनसे डरी है


अगर दिखती नहीं तुमको बहारें

तुम्हारी ही नज़र में कुछ कमी है


किसी के प्यार में ख़ुद को मिटा दे

भले ही चार दिन की ज़िंदगी है


जगाने को यहाँ रिश्ते हज़ारों

निभाने को मगर किसको पड़ी है


जगाएगा तो जग जाएगा इक दिन

तेरे अन्दर जो सोया आदमी है


नहीं कुछ और मुझको देखना है

मेरे दिल में तेरी सूरत बसी है


सभी में बस उसी का अक्स देखा

अजब ’आनन’ तेरी दीवानगी है ।


-आनन्द.पाठक-

ग़ज़ल 348

  ग़ज़ल 348[23]


1222  1222


समन्दर की व्यथा क्या है

ये नदिया को पता क्या है


उड़ानों में परिंदो से

न पूछो मर्तबा क्या है


जो पगड़ी बेंच दी तुमने

तो बाक़ी अब बचा क्या है


किसी के वास्ते हमदम !

समय रुकता भला क्या है ?


गले सबको लगा .प्यारे!

कि दुनिया में रखा क्या है ।


मुहब्बत में फ़ना होना

तो इसमें कुछ नया क्या है ।


हिमायत सच की करते हो

अरे! तुमको हुआ क्या है


कभी मिलना जो ’आनन’ से

समझ लोगे वफ़ा क्या है ।



-आनन्द.पाठक-


ग़ज़ल 347

  


ग़ज़ल 347 [22]


1222---1222---1222---1222


हमारी बात क्या करना, हमारी छोड़िए साहिब !

मिला जो प्यार से हमसे. उसी के हो लिए साहिब !


पड़ी पाँवों में ज़जीरें, रवायत की जहालत की,

हमें बढने से जो रोकें उन्हें तो तोड़िए साहिब


हमेशा आप बातिल की तरफ़दारी में क्यों रहते

कभी तो सच की जानिब से ज़रा कुछ बोलिए साहिब


मुक़ाबिल आइना होते, पसीने क्यों छलक आते

हक़ीक़त तो हक़ीक़त है , न मुँह यूँ मोड़िए साहिब


शजर ज़िंदा रहेगा तो परिंदे चहचहाएँगे

हवाओं में ,फ़ज़ाओं में , न नफ़रत घोलिए साहिब


बसे हैं साँप बन कर जो, छुपे हैं आस्तीनों में

मुलव्विस हैं जो साजिश में उन्हें मत छोड़िए साहिब


हमें मालूम है क्या आप की मजबूरियाँ ’आनन’

सितम पर आप क्यॊं चुप हैं ,ज़ुबाँ तो खोलिए साहिब !


-आनन्द.पाठक-


ग़ज़ल 346

  



ग़ज़ल 346 [21]


2122--1212--22


काश! खुद से अगर मिला होता

भीड़ में यूँ न लापता होता  ।


रंग चेहरे का क्यों उडा करते

जब हक़ीक़त से सामना होता


तुम न होते तो ज़िंदगी फिर क्या

कौन साँसों में फिर बसा होता ?


वक़्त अपने हिसाब से चलता 

चाहने से हमारे क्या होता ।


बात सुननी ही जब नहीं मेरी

आप से और क्या गिला होता ।


पा ही जाता मैं मंज़िल-ए-मक़्सूद

एक ही राह जो चला  होता ।


वह भी आता तुझे नज़र ’आनन’

"ढाइ-आखर"- जो तू पढ़ा होता ।


-आनन्द.पाठक-

ग़ज़ल 345

  



ग़ज़ल 345[20]


212---212---212


देखने में लगते हों लगते भले

सोज़-ए-दिल से सभी हैं जले


एक धुन हो , लगन हो जिसे

क्या उसे पाँव के  आबले


रोशनी उसको भाती नहीं

जो अंधेरों में अब तक पले


देख कर आइना सामने

आप मुड़ कर किधर को चले


रंज किस बात का है तुझे

यार आ अब तो लग जा गले 


आदमी जो नहीं कर सका

वक़्त ने कर दिए फ़ैसले


जिस मकाँ में रहा उम्र भर

छोड़ कर आकबत को चले


तुमने देखा ही ’आनन’ कहाँ

इन चिराग़ों के पुरहौसले ।


-आनन्द.पाठक-


आख़िरत = परलोक

ग़ज़ल 344

  

ग़ज़ल 344 [19]


1212---1122---1212---112


मैं दूर जा के भी उसको कभी भुला न सका

करीब था तो कभी हाल-ए-दिल सुना न सका


तमाम उम्र इसी  इन्तिज़ार में गुज़री,

गया था कह के, मगर लौट कर वो आ न सका ।


हर एक दौर में थीं साज़िशें मिटाने की

करम ख़ुदा का था कोई हमें मिटा न सका ।


ख़याल-ए-ख़ाम थे अकसर जगे रहे मुझमें

मैं चाह कर भी नज़र आप से मिला न सका ।


बना के ख़ाक से फिर ख़ाक में मिलाए क्यों

ये खेल आप का मुझको समझ में आ न सका


जिधर है दैर-ओ-हरम, है उधर ही मयख़ाना

किधर की राह सही है कोई बता न सका ।


तेरी तलाश में ’आनन’ कहाँ कहाँ न गया 

मुक़ाम क्या था? कहाँ था ? कभी मैं पा न सका ।


-आनन्द.पाठक--


 

ग़ज़ल 343

  



ग़ज़ल 343[18]


221---2122  // 221---2122


आकर जो पूछ लेते, क्या हाल है हमारा ?

ताउम्र दिल ये करता ,सद शुक्रिया तुम्हारा ।


किस शोख़ से अदा से, नाज़ुक़ सी उँगलियों से

तुमने छुआ था मुझको, दहका बदन था सारा ।


होती अगर न तेरी रहम-ओ-करम, इनायत

तूफ़ाँ में कश्तियों को मिलता कहाँ किनारा !


दैर-ओ-हरम की राहें , मैं बीच में खड़ा हूँ

साक़ी ने मैकदे से हँस कर मुझे पुकारा ।


दिलकश भरा नज़ारा, मंज़र भी ख़ुशनुमा हो

जिसमें न अक्स तेरा ,किस काम का नज़ारा ।


जब साँस डूबती थी, देखी झलक तुम्हारी

गोया की डूबते को तिनके का हो सहारा ।


मैं ख़ुद में गुम हुआ हूँ , ख़ुद को ही ढूंढता हूँ

मुद्दत हुई अब आनन’, ख़ुद को नहीं निहारा !


-आनन्द.पाठक---


ग़ज़ल 342

 


ग़ज़ल 342


2122---2122---2122


यार के कूचे में जाना कब मना है !

दर पे उसके सर झुकाना कब मना है !


मंज़िलें तो ख़ुद नहीं आएँगी  चल कर

रास्ता अपना बनाना कब मना है !


प्यास चातक की भला कब बुझ सकी है

तिशनगी लब पर सजाना कब मना है !


रोकती हों जो हवाओं रोशनी को-

उन दीवारों को गिराना कम मना है !


ज़िंदगी बोझिल, सफ़र भारी लगे तो

प्यार के नग्में सुनाना कब मना है !


ज़िंदगी है तो सदा ग़म साथ होंगे

पर ख़ुशी के गीत गाना कब मना है !


जो अभी हैं इश्क़ में नौ-मश्क ’आनन’

हौसला उनका बढ़ाना कब मना है !


-आनन्द.पाठक-


ग़ज़ल 341

  ग़ज़ल 341


212---212---212---212


तेरी गलियों में जब से हैं जाने लगे

जिस्म से रूह तक मुस्कराने लगे


दूर से जब नज़र आ गया बुतकदा

घर तुम्हारा समझ  सर झुकाने लगे


इश्क़ दर्या है जिसका किनारा नही

यह समझने में मुझको ज़माने लगे


देखने वाला ही जब न बाकी रहा

किसकी आमद में खुद को सजाने लगे


ये ज़रूरी नहीं सब ज़ुबां ही कहे

दर्द आँखों से भी कुछ बताने लगे


तुमने मुझको न समझा न जाना कभी

दूसरों के कहे में तुम आने लगे ।


राह-ए-हक़ से तुम ”आनन’ न गुज़रे कभी

इसलिए सब हक़ीक़त फ़साने लगे ।


-आनन्द.पाठक-