सोमवार, 26 जुलाई 2021

ग़ज़ल 188

 1222---1222---1222---1222


ग़ज़ल 188

अगर मिलते न तुम मुझको, ख़ुदा जाने कि क्या होता
सफ़र तनहा मेरा होता कि दिल फिर रो दिया होता

हमें खुद ही नहीं मालूम किस जानिब गए होते
इधर जो मैकदा होता ,उधर जो बुतकदा  होता

चलो अच्छा हुआ, ज़ाहिद! अलग है रास्ता अपना
जो मयख़ाने के दर पर सामना होता तो क्या होता

निक़ाब-ए-रुख़ उठा लेते वो, मेरा दिल सँवर जाता
हक़ीक़त सामने होती ,मज़ा कुछ दूसरा होता

ये दुनिया भी किसी जन्नत से कमतर तो नहीं दिखती
हसद से या अना से तू जो बाहर आ गया होता

भले कुछ दो न झोली में ,ये दिल अपना फ़क़ीराना
फ़क़ीरों के लबों पर तो सदा हर्फ़-ए-दुआ होता

मुहब्बत भर गई होती सभी के दिल में जो”आनन’
तो फिर यह देखती दुनिया ज़माना क्या से क्या होता !

-आनन्द.पाठक-

हसद = ईर्ष्या ,जलन,डाह
अना = अहम , अहंकार ,घमंड


ग़ज़ल 187

 ग़ज़ल 187

221--2121--1221--212


वह रंग बदलता है सियासत के नाम पर
जो गुल खिला रहा है शराफ़त के नाम पर

अब बागबाँ का नाम हवा में उछल रहा
लूटा चमन को उसने हिफ़ाज़त के नाम पर

कुछ रोटियाँ हैं सेंकनी घर से निकल पड़े
अब वोट साधने हैं इयादत के नाम पर

आता है जब चुनाव का मौसम कभी इधर
कुछ झुनझुने थमा दिया राहत के नाम पर

कलियाँ अगर हैं गा रहीं तो गाने दो बेहिचक
रोको न उनको रस्म-ए-नसीहत के नाम पर

वादे तमाम वादे है, सौगात सैकड़ों
कब तक छला करोगे यूँ ग़ुरबत के नाम पर

दुनिया बदल गई है ,हवाएँ बदल गईं
’आनन’  तू रो रहा है रवायत के नाम पर 

=आनन्द.पाठक-


ग़ज़ल 186

 ग़ज़ल 186

112---112---112--112--//112--112--112--112

बह्र-ए-मुतदारिक मख़्बून मुसम्मन मुज़ाइफ़ 


तुम नादाँ हो ,नावाक़िफ़ हो,  मैं अर्ज़-ए-मुहब्बत क्या करता  !
आदाब-ए-मुहब्बत क्या जानो, ग़म-ए-दिल की शिकायत क्या करता !

मालूम तुम्हें भी है सब कुछ, इक दिल की चाहत क्या होती
’लैला-मजनूँ के किस्से का , मैं और वज़ाहत क्या करता
 
आना ही नहीं था जब तुमको ,दीदार नहीं होना है कभी
फिर झूठे वादे ख़्वाबों से , तामीर-ए-इमारत क्या करता

मौसम का आना जाना है, कभी जश्न-ए--फ़ज़ाँ ,कभी दौर-ए-खिजाँ
दो दिन की फ़ानी दुनिया में ,इजहार-ए-मसर्रत  क्या करता

बेमतलब कौन यहाँ मिलता , सबके अपने अपने मतलब
जब दाल गली उसकी न यहाँ , वह मुझसे रफ़ाक़त क्या करता

तसवीर जो क़ायम थी दिल में , तनहाई में बातें कर ली
सजदे में झुकाया सर अपना ,हर दर पे इबादत क्या करता

’आनन’ क्यों ख़ौफ़ क़यामत का, जब उनकी इनायत हो मुझ पर
जब वो ही मेरे हाफ़िज़ ठहरे ,मैं खुद की हिफ़ाज़त क्या करता 

-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ 
तामीर-ए-इमारत = भवन निर्माण
इज़हार-ए-मसर्रत = ख़ुशी का इज़हार 
रफ़ाक़त = दोस्ती 
हाफ़िज़ = हिफ़ाज़त करने वाला

ग़ज़ल 185

 

 ग़ज़ल 185
221--2121---1221---212


पहले थी जैसी अब वो क़राबत नहीं रही
लहज़े में आप की वो शराफ़त नहीं रही

दो-चार गाम साथ में चलना ही था बहुत
अब ज़िन्दगी से वै्सी रफ़ाक़त नहीं रही

’तेशे’ से खुद को मार के ’फ़रहाद ’ मर गया
उलफ़त में आजकल वो शहादत नहीं रही

मौसम बदल गया है तो तुम भी बदल गए
अब बातचीत में वो नज़ाक़त नहीं रही

अब हाय! हेलो! हाथ मिलाना ही रह गया
’दिल से मिलाना दिल को’-रवायत नहीं रही

जब से अना गुरूर से दामन छुड़ा लिया
फिर ज़िन्दगी से कोई शिकायत नहीं रही

दुनिया का दर्द ढालता अपनी ग़ज़ल में तू
’आनन’ तेरी ग़ज़ल में लताफ़त नहीं रही ।

-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ
क़राबत = सामीप्य ,निकटता ,दोस्ती
दो-चार गाम = दो-चार क़दम
लताफ़त = बारीक़ियाँ








ग़ज़ल 184

 ग़ज़ल 184

21--121--121--122


लख़्त-ए-जिगर का खोना क्या है!
निशदिन उसका  रोना क्या है !

जो होना है होगा ही वह ,
फिर जादू क्या , टोना क्या है  !

मन का दरपन साफ़ नहीं तो
तन का जल से धोना क्या है !

गठरी तो लुट जानी इक दिन
दिल से लगा कर सोना क्या है  !

फ़स्ल वही काटेगा, प्यारे !
तय  कर लेना , बोना क्या  है!

जो रिश्ते नाकाम हुए हों 
उन रिश्तों को ढोना क्या है !

सोन चिरैया देस गई है
दामन और भिगोना क्या है !

एक खिलौना टूटा ’आनन’ 
माटी का था रोना क्या है  !

-आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ 
लख़्त-ए-जिगर का = दिल के टुकड़े का


मंगलवार, 13 जुलाई 2021

ग़ज़ल 183

 ग़ज़ल 183: सौगंध संविधान की

221--2121---1221---212

सौगंध  संविधान की खाता है आजकल
’जयचन्द’ से भी हाथ मिलाता है आजकल

नाकामियों का ठीकरा औरो पे फोड़ता
मासूम सी वह शक्ल बनाता है आजकल

जब बाजुओं पे उसको भरोसा नहीं रहा
’तोते’ को अपना हाथ दिखाता है आजकल

नाआशना वो इश्क से ,महरूम प्यार से
नफ़रत जगा के आग लगाता है आजकल

वह दिन हवा हुए कि चमन में बहार थी
पंछी भी कोई अब नहीं गाता है आजकल

करता है संविधान की बातें बड़ी बड़ी
अब नाख़ुदा भी नाव डुबाता है आजकल

दुनिया की बात और है ’आनन’ की बात और
अपनी वो राह खुद ही बनाता है आजकल


-आनन्द.पाठक-


ग़ज़ल 182

 ग़ज़ल 182

221---2121---1212---212


जब ’हां’ में ’हाँ’ किया तो रफ़ाकत समझ लिया
हिम्मत से ’ना’ कहा तो बग़ावत  समझ लिया

आतिश ज़बान, सोच में बारूद है भरा
सरकश हुआ तो ख़ुद को क़यामत समझ लिया

हालात ज़िन्दगी का  बताने गया उसे
अपने ख़िलाफ़ उसने शिकायत  समझ लिया

नेता नया नया है सियासत की बात है 
ख़िदमत ग़रीब का भी तिजारत समझ लिया

जादूगरी थी उसकी ,दलाइल भी बाकमाल
उसके फ़रेब को भी ज़हानत समझ लिया

यह बेबसी की इब्तिदा या इन्तिहा कहें ?
’साहब’ के हर सितम को इनायत समझ लिया

’आनन’ अजीब दौर है लोगों को क्या कहें
जाहिल की बात हर्फ़-ए-जमानत समझ लिया

-आनन्द.पाठक-


शुक्रवार, 9 जुलाई 2021

ग़ज़ल 181

 ग़ज़ल 181

221---2121---1221---212


रिश्तों की बात कौन निभाता है आजकल 
वह बेग़रज़ न हाथ मिलाता  है आजकल

यह और बात है उसे सुनता न हो कोई
फिर भी वो मन की बात सुनाता है आजकल

कहना तो चाहता था मगर कह नहीं सका
कोई तो दर्द है ,वो छुपाता  है आजकल

लोगों के अब तो तौर-तरीक़े बदल गए
किस दौर की तू बात सुनाता है आजकल 

मौसम चुनाव का अभी आने को है इधर
वह ख़्वाब रोज़-रोज़  दिखाता है आजकल

सच बोल कर भी देख लिया ,क्या उसे मिला ?
वह झूठ की दुकान चलाता है आजकल 

’आनन’ बदल सका न ज़माने के साथ साथ
आदर्श का वो कर्ज़ चुकाता है आजकल ।


-आनन्द पाठक-