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शुक्रवार, 21 मार्च 2025

अनुभूतियाँ 180

  अनुभूतियाँ 180/67


717
मुझे ग़लत ही समझा सबने
कभी किसी ने दिया साथ क्या
तुमने भी गर समझा ऐसा
तो इसमे फिर नई बात क्या ।

718
साथ निभाने वाली बातें
मैं कब भूला, तुम ही भूली
याद दिला कर भी क्या होगा
तुम्हें नही जब करना पूरी ।

719
कौन तुम्हारे साथ खड़ा था
किसने बना रखी थी दूरी
उन्हे परखना, उन्हें समझना
तुमने समझा नही ज़रूरी

720
आँखों के सपनों की ख़ातिर
गिरते, उठते, थकते, चलते
और ज़िंदगी कट जाती है
सुख दुख के साए में पलते

-आनन्द.पाठक-

अनुभूतियाँ 179

  अनुभूतियाँ 179/66

713

सत्य कहाँ तक झुठलाओगे

छुपता नहीं, न दब पाएगा ।

ख़ुद को धोखा कब तक दोगे

झूठ कहाँ तक चल पाएगा ।


714

सुख दुख चलते साथ निरन्तर

जबतक जीवन एक सफ़र है

जितना उलझन मन के बाहर

अधिक कहीं मन के अंदर है।


715

वक़्त गुज़रने को गुज़रेगा

भला बुरा या चाहे जैसा

ज़ोर नहीं जो अगर तुम्हारा

ढलना होगा तुमको वैसा


716

क्या करना है तुमको सुन कर

कैसी गुज़र रही है मुझ पर

शायद तुमको खुशी न होगी
ज़िंदा रहता हूँ मर मर कर


-आनन्द.पाठक-


इसी अनुभूतियों कॊ आ0  विनोद कुमार उपाध्याय [ लखनऊ] के स्वर में यहाँ सुनें और आनन्द उठाएँ

https://www.facebook.com/share/v/1CAa5Jw1Ra/



अनुभूतियाँ 178

 अनुभूतियाँ 178/65


709
हाथ मिलाना हाय! हलो! बस
दिल का दिल से  पर्दादारी
मन से मन ही नही मिला जो
बाक़ी तो बस दुनियादारी ।

710
व्यर्थ विवेचन क्या करना अब
चाकू कहाँ किधर रखना था 
अन्तिम परिणति नियति यही थी
खरबूजे़ को ही कटना  था ।
च़7ज
चचकण कण में सब देख रहे हैं
सत्ता का विस्तार तुम्हारा ।
ग्यानी-ध्यानी सोच रहे हैं
क्या होगा आकार तुम्हारा ।

712
रंग मंच पर अभिनय तबतक
जब तक पर्दा नहीं गिरा है
कर्म सभी के निर्धारित हैं
जिनको जितना ’रोल’ मिला है


-आनन्द.पाठक-


अनुभूतियाँ 177

 अनुभूतिया 177/64


705
मेरी कुटिया पर ही केवल
सदा नजर रखती बिजली है
तडक भडक बस करती रहती
कभी नहीं गिरती पगली है ।

706
कल तक थे जो शिखर बिन्दु पर
गिरे पड़े है , खेला यह भी
सिंहासन पर धूल जमी है
एक तमाशा, मेला यह भी

707
महफ़िल सजी रहा करती थी
बजती थी नौबत-शहनाई
रंग महल वीरान हुए अब
ईंट ईंट दे रही गवाही ।

708
लोग तुम्हे तब तक पूछेंगे
जब तक उनको तुमसे मतलब
बाद तुम्हे वो छोड़ चलेंगे
ना जाने किस मोड़ कहाँ कब

-आनन्द.पाठक-

अनुभूतियाँ 176

  अनुभूतियाँ 176/63


701

जब जब छोड. गई तुम मुझको,

नदी प्यार की फिर भी रहती ।

ऊपर ऊपर भले दिखे ना,

भीतर भीतर बहती रहती ।


702

तुम क्या जानो, दिल तेरे बिन

क्या क्या नहीं सहा करता है

नियति मान कर चुप रहता है

कुछ भी नहीं कहा करता है ।


703

राह देखती रहती निशदिन

वही प्रतीक्षारत हैं आँखें

आओगे तुम इक दिन वापस

लटकी अँटकी रहती साँसें


704

मन की सूनी कुटिया मे जब

और नहीं कोई रहता है

तब तेरी यादें रहती हैं

मन जिनसे बातें करता है


-आनन्द पाठक-

अनुभूतियाँ 175

  अनुभूतियाँ 175/62


697

होली आई ,तुम भी आओ,

खेलेंगे हम मिल कर होली ।

सात रंग से रँगना, प्रियतम !

प्रीति प्रणय हो या रंगोली ।


698

मार न कान्हा यूँ पिचकारी,

एक रंग मे रँगी चुनरिया ।

चाहे जितना रंग लगा  दे,

चढ़े न दूजो रंग, सँवरिया !


699

होली का यह पर्व खुशी का

प्रेम रंग से तुम रँग देना ।

लाल गुलाल लगा कर सबको,

अपनी बाँहों में भर लेना ।


700

अवधपुरी में सीता खेलें

वृंदावन में राधा रानी । 

रंग लगा कर गले लगाना

होली की यह रीति पुरानी ।


-आनन्द.पाठक-


अनुभूतियाँ 174

  अनुभूतियाँ 174/61


693

शायद मैने ही देरी की

अपनी बात बताने में कुछ

बरसोंं लग जाएंगे शायद

दिल की चाह जताने में कुछ।


694

जब जब दूर गई तू मुझसे

कितने गीत रचे यादों में

ढूँढा करता हूँ सच्चाई

तेरे उन झूठे वादों में ।  


695

दोष किसी को क्या देता मैं

सब अपने कर्मों का फल है

सबको मिलता है उतना ही

 जिसका जितना भाग्य प्रबल है।


696

प्रेम चुनरिया मैने रँग दी,

बाक़ी जो है तुम भर देना।

आजीवन बस रँगी रहूँ मैं,

प्रीति अमर मेरी कर देना ।


-आनन्द पाठक-






अनुभूतियाँ 173

 689

साथ अगर ना तुम होते तो
कैसे कठिन सफर यह कटता
प्राण वायु ही जब ना हो तो
इस तन का फिर क्या मैं करता

690
नदिया की यह चंचल लहरें
साहिल से क्या क्या बतियाती
चाहे हों पथरीली राहें -
गीत मिलन के गाती जाती

691
मै कैसे यह खुद बतलाता
पूछा तुमने, बात बता दी
बदन तुम्हारा संग़़-ए-मरमर
ओठ गुलाबी, नैन शराबी

692
मन के अंदर द्वंद बहुत है
ग्रंथ कहे कुछ मन कुछ कहता
तेरे घर की राह अनेको
ज्ञानी भी उलझन मे रहता 

-आनन्द.पाठक-

अनुभूतियाँ 172

  अनुभूतियाँ 172/59

685

बंजारों-सा यह जीवन है

साथ चला करती है माया

साथ साँस जैसे  चलती है

जहाँ जहाँ चलती है काया


686

समय कहाँ रुकता है, प्यारे !

धीरे धीरे चलता रहता ।

अपने कर्मों का जो फ़ल हो

इसी जनम में मिलता रहता ।


687

प्यास मिलन की क्या होती है

भला पूछना क्या आक़िल से 

वक़्त मिले तो कभी पूछना 

किसी तड़पते प्यासे दिल से । 


688

मन का जब दरपन ही धुँधला

खुद को कैसे पहचानोगे ?

राह ग़लत क्या, राह सही क्या

आजीवन कैसे जानोगे ?


-आनन्द.पाठ्क-

[ आक़िल = अक्ल वाला ]


अनुभूतियाँ 171

 अनुभूतियां~ 171/58

681

जीवन चलता रहता अविरल

कहीं कठिन पथ, कहीं सरल है

जीवन इक अनबूझ पहेली

कभी शान्त मन ,कभी विकल है ।

682

सोन चिरैया रोज़ सुनाती

अपनी बीती नई कहानी

कभी सुनाती खुल कर हँस कर

कभी आँख में भर कर पानी ।


683

जब से तुम वापस लौटी हो

लौटी साथ बहारें भी हैं ।

चाँद गगन में अब हँसता है

साथ हँस रहे तारे भी हैं ।


684

अगर समझ में कमी रही तो

कब तक रिश्ते बने रहेंगे

स्वार्थ अगर मिल जाए इसमे

कब तक रिश्ते बचे रहेंगे ।


-आनन्द.पाठक-

अनुभूतियाँ 170

 अनुभूतियाँ 170/57


677
तुम क्या जानो विरह वेदना
जिसने देखी नहीं जुदाई
होठो पर हो हास भले ही
आँख विरह मे तो भर आई

678
बहुत दिनों के बाद मिली हो
लौट के आया है यह शुभ दिन
भला बुरा जो भी हो कहना
कह लेना फिर और किसी दिन

679
छोड़ो जाने दो, रहने दो
वही दिखावा, वही बहाना
अपने ही दिल की बस सुनना
मेरे दिल को कब पहचाना 

680
तुम गमलों में पली हुई हो
तुम्हे सदा मिलती है छाया
नंगे पाँव चला हूँ अबतक
मैं तपते सहरा से आया ।

-आनन्द.पाठक-

अनुभूतियाँ 169

  अनुभूतियाँ 169/56


673

ऐसे भी कुछ लोग मिलेंगे

ख़ुद को ख़ुदा समझते रहते

आँखों पर हैं पट्टी बाँधे

अँधियारों में चलते रहते ।


674

दिल जो कहता, कह लेने दो

कहने से मत रोको साथी !

दीपक अभी जला रहने दो

रात अभी ढलने को बाक़ी


675

माना राह बहुत लम्बी है

हमको तो बस चलना साथी

जो रस्मे हों राह रोकती

मिल कर उन्हे बदलना साथी


676

नीड बनाना कितना मुश्किल

उससे मुश्किल उसे बचाना

साध रही है दुनिया कब से

ना जाने कब लगे निशाना ।

-आनन्द पाठक-

अनुभूतियाँ 168

  अनुभूतियाँ 168/55


669

मुक्त हंसी  जब हँसती हो तुम

हँस उठता है उपवन मधुवन

कोयल भी गाने लगती है 

और हवाएँ छेड़े सरगम ।


670

मछली जाल बचा कर निकले

लेकिन कब तक बच पाती है

प्यास अगर दिल में जग जाए

स्वयं जाल में  फँस जाती है ।


671

अवसरवादी लोग जहाँ हों

ढूँढा करते रहते अवसर

स्वार्थ प्रबल उनके हो जाते

धोखा देते रह्ते  अकसर


672

कितनी बार लड़े, झगड़े हम

रूठे और मनाए भी हैं ।

विरह वेदना में रोए तो

गीत खुशी के गाए भी हैं।


-आनन्द.पाठक-


अनुभूतियाँ 167

  अनुभूतियाँ 167/54

665

लोग समझते रहे हमेशा

अपनी अपनी ही नज़रों से

तौल रहे है प्रेम हमारा

काम-वासना के पलड़ों से।


666

नहीं भुलाने वाली बातें

तुम्ही बता दो कैसे भूलें ?

माना हाथ हमारे बौने

चाह मगर थी, तुमको छू लें।


667

ऊषा की तुम प्रथम किरण बन

आती हो जब द्वार हमारे ,

खुशबू से भर जाता आँगन

खिल जाते हैं सपने सारे ।


668

आशा और निराशा के संग

 तुमने जितना पिया अँधेरा

एक अटल विश्वास प्रबल था

तब जा कर यह हुआ सवेरा ।


-आनन्द.पाठक--




अनुभूतियाँ 166

  अनुभूतियां 166/53


661
नदी किनारे गाता कोई
गीत विरह का किसे सुनाता
चला गया जो कब आता है
जान रहा फिर किसे बुलाता ।

662
सबकी अपनी अपनी दुनिया
सब अपने में ही खोए हैं
काटेंगे कल फ़सल वही सब
अबतक जिसने जो बोए हैं

663
जलता है जब गुलशन मेरा
*कोई हँसता है मन ही मन*
जितना समझाता हूँ दिल को
उतनी बढ़ती जाती उलझन

664
मत पूछो हमराही  मेरे
कैसे थे या क्या थे वो दिन
 राजमहल थी कुटिया मेरी
आज खंडहर है उसके बिन 

-आनन्द पाठक-

अनुभूतियाँ 165

  अनुभूतियाँ 165/52

657

राम-नाम का एक सहारा
जब जीवन में मिल जाता है
मन अपना पावन हो जाता
भक्ति-भाव भी खिल जाता है ।


658
अतुलित छवि है राम लला की
मधुर मधुर मुसकान अधर पर
कमल नयन है बदन कमल सा
बोल रहा हो मानो पत्थर ।

659
राम नाम की महिमा जग में
कौन नहीं जो जान रहा है ।
पत्थर पत्थर तक तर जाते
हर कोई यह मान रहा है ।


660
राम लला की पावन प्रतिमा
प्राण प्रतिष्ठा वाला शुभ दिन
इस अवसर के साक्षी बनने
काटी कितनी सदियाँ गिन गिन।

-आनन्द.पाठक-

अनुभूतियाँ 164

  अनुभूतियां 164/51



653
काल-खंड का पहिया चलता
सुख दुख का क्रम बारम्बारा
कभी उच्च्चतम, कभी निम्नतम
इसी बीच में जीवन सारा ।


654
सरदी हो चाहे गरमी हो
आजीवन चलना पड़ता है
चलते रहना ही जीवन है
रुकना जीवन की जड़ता है ।

655
धरती के अन्तस की पीड़ा
बादल क्या समझे क्या जाने
कहाँ बरसना, नहीं बरसना
बादल यह सब कब पहचाने ।

656
रात अँधेरी नीरव निर्जन
और राह उस पर दुर्गम है
ज्योति-पुंज हो अगर ग्यान का
सफ़र सुहाना क़दम क़दम है ।

-आनन्द.पाठक-

अनुभूतियाँ 163

  अनुभूतियाँ 163/50


649

कभी प्रेम का ज्वार उठा है

कभी दर्द के बादल छाए ।

जीवन भर मैने जीवन को

मिलन-विरह के गीत सुनाए ।


650

चाहे जितना अँधियारा हो

एक रोशनी मन के अन्दर

सतत जला करती रहती है

राह दिखाती रहती अकसर


651

तीर कमान लिए हाथों में

काल, व्याध बन बैठा छुप कर

इक दिन तो जद में आना है

कब तक रह पाओगे बच कर।


652

साँस साँस पर कर्ज उसी का

वही साँस में  घुला हुआ है ।

 मन रहता आभारी उसका

सतगुण से जो धुला हुआ है ।


-आनन्द.पाठक-


अनुभूतियाँ 162

 अनुभूति 162/49


645
नैतिकता की बातें सुन सुन
शेर हुआ क्या शाकाहारी ?
कल तक 'रावण' के चोले में
आज बने क्या अवध बिहारी ?

646
पग पग पर हैं गति अवरोध
ठोकर खा खा कर है चलना
जीवन इतना सरल नहीं है
गिरना उठना, स्वयं सँभलना । 

647
सोन चिरैया गाती जाए
अपनी धुन अपनी मस्ती में
हँस कर जीना,खुल कर हँसना
जितना दिन रहना बस्ती में ।

648
सबका अपना जीवन दर्शन
सबकी अपनी राम कहानी
अन्त सभी का एक समाना
बाक़ी चीज़े आनी-जानी ।

-आनन्द.पाठक-





अनुभूतियाँ 161

  अनुभूति 161/48

641

सुन कर मेरी प्रेम-कहानी

साथी ! तुमको क्या करना है?

कर्ज किसी का मेरे सर पर

आजीवन जिसको भरना है।


642

कसमे वादे प्यार वफ़ा सब

जब तुमने ही भुला दिया है

मैने भी अपनी चाहत को

थपकी दे दे सुला दिया है ।


643

जो भी करना खुल कर करना

द्वंद पाल कर क्या करना है 

दुनिया की तो नज़रें टेढ़ी

दुनिया से अब क्या करना है ।


644

सत्य नहीं जब सुनना तुमको

और तुम्हे क्या समझाऊँ मैं

झूठ तुम्हे सब लगता है तो

चोट लगी क्या दिखलाऊँ मैं।

-आनन्द.पाठक-