शनिवार, 2 मार्च 2024

ग़ज़ल 353

 



ग़ज़ल 353 [28]

2122---2122---212


ज़िंदगी का फ़लसफ़ा कुछ और है

आदमी का सोचना कुछ  और है ।


बात वाइज़ की सही अपनी जगह

दर हक़ीकत सामना कुछ और है ।


तुम भले ही जो कहो, हँस कर कहो

जर्द चेहरा कह रहा कुछ  और है।


क्यों तुम्हे दिखता नहीं चेहरे का सच

क्या तुम्हारा आइना कुछ और है ?


दिल कहे जब भी कहे तो सच कहे

लग रहा तुमने सुना कुछ और है ।


वस्ल के पहले ख़याल-ए-वस्ल हो

फिर तड़पने का मज़ा कुछ और है।


प्रेम का मतलब नहीं 'आनन' हवस

प्रेम का तो रास्ता कुछ और है ।


-आनन्द.पाठक-


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