मंगलवार, 31 अगस्त 2021

अनुभूतियाँ 88

 क़िस्त 88


349

सच की करें हिमायत खुल कर 

कहाँ गए वो करने वाले

कहीं नहीं अब दिखते हैं वो

उलफ़त में थे मरने वाले


350

धीरे धीरे छोड़ गए सब

एक तुम्हारी आस बची थी

तुम भी अब जाने को कहती

जो कि आख़िरी साँस बची थी


351

जाते जाते ख़त ले जाना

लिखा तुम्हे था भेज न पाया

सोचा था अब कुछ न लिखूँगा

लेकिन दर्द सहेज न पाया


352

एक ’कल्पना’ एक ’प्रेरणा’

कौन बसी थी ?ज्ञात नहीं है

जीवन भर की "अनुभूति" थी 

पल-दो पल की बात नहीं है 

-आनन्द,पाठक-


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