मंगलवार, 31 अगस्त 2021

अनुभूतियाँ 97

 


क़िस्त 97


385

धुआँ भर गया है कमरे में 

खोल खिड़कियाँ दरवाजे सब

वरना घुट-घुट मर जायेगा

नई हवाएँ आने दे अब 


386

याद नहीं अब कुछ रहता है

सुबह हुई या शाम हुई है

कौन गया है, कौन आया है

हस्ती किसके नाम हुई है


387

ख़ामोशी में कौन छुपा है

आँखों से बोला करता है

दर्द तुम्हारा तुम से पहले

आँसू में घोला करता है


388

इश्क़ हक़ीक़ी, इश्क़ मजाज़ी

एक इश्क़ के पहलू दो हैं

फ़र्क़ नहीं फिर रह जाता है

एक जगह जब मिलते वो हैं


-आनन्द.पाठक-


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