शुक्रवार, 20 अगस्त 2021

अनुभूतियाँ 78

क़िस्त 78

309

निश्छल तुम भी ,निश्छल मैं भी 

लेकिन कुछ है दुनियादारी

एक ज़रूरत बन जाती है 

कुछ बातों की पर्दादारी


310

नादाँ है ,दीवाना है वह

दुनिया उसको कहती पागल

प्यास बुझाता है धरती की

ख़ुद ही प्यासा रहता बादल


311

ना मैं राजा ,ना तुम रानी

पर दोनो की एक कहानी

आँख तुम्हारी भी नम रहती

आँख मेरी भी भर भर आनी


312

परबत घाटी सहरा सहरा

नदिया बहती रही निरन्तर

हँसती रहती ऊपर ऊपर

प्यास छुपा कर दिल के अन्दर


-आनन्द.पाठक-

 

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