मंगलवार, 31 अगस्त 2021

अनुभूतियाँ 93

 क़िस्त 93


369

प्यास अधूरी रह जाती है

दुनिया भर के बंधन-साँकल

कभी इधर है धरती प्यासी

कभी उधर है प्यासा बादल


370

बैठे ठाले लिख देते हो

मेरे सर इलजाम लगा कर

रत्ती भर था दोष न मेरा

किसे कहूँ मै रो कर-गा कर


371

जीवन की आपा-धापी में

इतना वक़्त नहीं मिल पाया

ख़ुद से ख़ुद भी निल न सका मैं

हासिल भी लाहासिल पाया


372

केन्द्र-परिधि का रिश्ता है जो

ठीक वही रिश्ता गोरी का

दूर दिखे पर दूर नहीं वो

एक छोर है उस डोरी का


-आनन्द.पाठक-


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