शनिवार, 1 जनवरी 2022

नए वर्ष [ 2022 ] की प्रथम भेंट---एक सूचना

        नए वर्ष की प्रथम भेंट --- एक सूचना 


मित्रो !


कुछ दिन पूर्व , अपनी एक प्रकाशाधीन पुस्तक - रोज़ तमाशा --मेरे आगे  [ व्यंग्य संग्रह ] का आवरण पृष्ठ [ कवर ] आप लोगों से साझा किया था ।

आप लोगों के आशीर्वाद और शुभकामनाओं के फलस्वरूप उक्त पुस्तक अब प्रकाशित हो कर आ गई है और पाठकों के लिए उपलब्ध है ।

 इसमे 29- व्यंग्य लेख संग्रहित हैं जो समाज में व्याप्त सामाजिक, राजनैतिक विद्रूपताओं पर और अन्य विसंगतियों पर लिखी गईं  व्यंग्य कथाएँ, लघु व्यथाएँ हैं । इनमे से कुछ व्यंग्य-लेख

इस मंच पर समय समय पर लगाता  रहा हूँ और आप की उत्साहवर्धक टिप्पणियाँ  प्राप्त होती रही हैं ।


आदरणीय समीर लाल ’समीर’ जी ने इस संग्रह का आमुख  लिख कर ’आशीर्वचन’ दिया है । समीर लाल जी स्वयं में व्यंग्य के एक सशक्त हस्ताक्षर हैं  और ’मोटिवेशनल लेखक भी हैं।

आप का एक  एक ब्लाग -www.udantashtari.blogspot.com "उड़न तश्तरी’- के नाम से बहु चर्चित है। आमुख में लिखते हैं--


"---आज जब उनके  [ आनन्द.पाठक के ] आने वाले व्यंग्य-संग्रह की पांडुलिपि से गुज़र रहा हूँ तब पुन: वही आश्चर्य मिश्रित प्रशंसा भाव से भरा हुआ हूँ । 

एक सिविल अभियन्ता जो  गीत, ग़ज़ल, कविता,माहिया के माध्यम से दिल लिखता हो, वो दूसरी तरफ़ समाज में पसरी विद्रूपताओं पर कितनी पैनी नज़र रखता है । 

यह बात हैरान करती है ।---[ इसी पुस्तक से ]


यह मेरी आठवीं प्रकाशित पुस्तक है । जिनमे से  3- पुस्तकें तो व्यंग्य संग्रह की ही हैं । बाक़ी सब किताबें -गीत-ग़ज़ल-माहिया संग्रह की हैं।


शरणम श्रीमती जी [ व्यंग्य संग्रह ]

सुदामा की खाट [ -तदैव- ]

अल्लम गल्लम बैठ निठल्लम  [ -तदैव ]


इन सभी पुस्तकॊ का प्रकाशन अयन प्रकाशन .नई दिल्ली ने किया है । यह तमाम पुस्तकें निम्न पते से प्राप्त की जा सकती है या सम्पर्क किया जा सकता है।

 

श्री संजय 

अयन प्रकाशन 

जे-19/39 ,राजापुरी ,उत्तम नगर


नई दिल्ली 110 059

Mobile/whatsapp  92113  12372


आशा है कि पूर्व की भाँति यह संग्रह भी आप लोगों को पसन्द आएगा।

पुस्तक के गुण-दोष की विवेचना /समीक्षा आप सुधी पाठकों से ज़्यादा कौन कर सकता है । आप की टिप्पणियों का स्वागत रहेगा।


सादर 

-आनन्द.पाठक-


रविवार, 31 अक्टूबर 2021

गीत 72

 गीत : ---मौसम बदलेगा


सुख का मौसम, दुख का मौसम, आँधी-पानी का हो मौसम
मौसम का आना-जाना है , मौसम है मौसम बदलेगा ।---मौसम बदलेगा॥

अगर कभी फ़ुरसत  हो तुमको, उसकी आँखों में पढ़ लेना
जिसकी आँखों में सपने थे  जिसे ज़माने ने लू्टे  हों ,
आँसू जिसके सूख गए हो, आँखें जिसकी सूनी सूनी
और किसी से क्या कहता वह, विधिना ही जिससे रूठें हो

दर्द अगर हो दिल में गहरा, आहों में पुरज़ोर असर हो
 चाहे जितना पत्थर दिल हो, आज नहीं तो कल पिघलेगा ।---कल पिघलेगा ।।

दुनिया क्या है ? जादूघर है, रोज़ तमाशा होता रहता
देख रहे हैं जो कुछ हम तुम, जागी आँखों के सपने हैं 
रिश्ते सभी छलावा भर हैं, जबतक मतलब साथ रहेंगे
जिसको अपना समझ रहे हो, वो सब कब होते अपने हैं 

जीवन की आपाधापी में, दौड़ दौड़ कर जो भी जोड़ा 
चाहे जितना मुठ्ठी कस लो, जो भी कमाया सब फिसलेगा ।--सब फ़िसलेगा।

जैसा सोचा वैसा जीवन, कब मिलता है, कब होता है
जीवन है तो लगा रहेगा, हँसना, रोना, खोना, पाना
काल चक्र चलता रहता है. रुकता नहीं कभी यह पल भर
ठोकर खाना, उठ कर चलना, हिम्मत खो कर बैठ न जाना

आशा की हो एक किरन भी और अगर हो हिम्मत दिल में
चाहे जितना घना अँधेरा, एक नया सूरज निकलेगा ।---सूरज निकलेगा।

विश्वबन्धु, सोने की चिड़िया, विश्वगुरु सब बातें अच्छी
रामराज्य की एक कल्पना, जन-गण-मन को हुलसा देती 
अपना वतन चमन है अपना, हरा भरा है खुशियों वाला
लेकिन नफ़रत की चिंगारी बस्ती बस्ती झुलसा देती ।

जीवन है इक सख्त हक़ीक़त देश अगर है तो हम सब हैं
झूठे सपनों की दुनिया से कबतक अपना दिल बहलेगा ।---दिल बहलेगा।


-आनन्द पाठक-

शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2021

ग़ज़ल 199

 ग़ज़ल 199


122---122---122---122


कहीं तुम मेरा आइना तो नहीं हो ?

मेरे हक़ की हर्फ़-ए-दुआ तो नहीं हो ?


ये माना तुम्हारे मुक़ाबिल न कोई

मगर इसका मतलब ख़ुदा तो नहीं हो 


ये लम्बी ख़मोशी डराती है मुझको

कहीं बेसबब तुम ख़फ़ा तो नहीं हो


हवाओं में ख़ुशबू अभी तक तुम्हारी

कहीं तुम ख़ुद अपना पता तो नहीं हो ?


ख़ला से मेरी लौट आती सदाएँ

कहीं तुम मेरे हमनवा तो नहीं हो ?


बहुत लोग आए तुम्हारे ही जैसे

फ़ना हो गए, तुम जुदा तो नहीं हो


किसी दिन तुम्हें ढूँढ लूँगा यह ’आनन’

मेरे दिल मे हो, लापता तो नहीं हो


-आनन्द.पाठक-



मंगलवार, 26 अक्टूबर 2021

गीत 71

             एक गीत : दीपावली पर [2021]


आज दीपावली, ज्योति का पर्व है

दीप की मालिका हम सजाते चलें ।


आज मिल कर सजाएँ नई अल्पना

झूमने नाचने का करें सिलसिला

पर्व ख़ुशियों का है और उल्लास का

भूल जाएँ जो कोई हो  शिकवा,गिला


मन बँटा हो भले, रोशनी कब बँटी

प्यार का दीप दिल में जलाते चलें ।


धर्म के नाम पर व्यर्थ उन्माद में

चेतना मर गई, भावना मर गई

मन के अन्दर की सब खिड़कियाँ बन्द हैं

उनके कमरे में कितनी घुटन भर गई


सोच नफ़रत भरी है, जहर भर गया

इन अँधेरों को पहले मिटाते चलें ।


झोंपड़ी का अँधेरा करें दूर हम

झुग्गियों बस्तियों में जला कर दिए

एक दिन चाँदनी भी उतर आएगी

आदमी जो जिए दूसरों के लिए ।


अब अँधेरों में कोई न भटके कहीं

सत्य की राह क्या है ? दिखाते चलें


आज दुनिया खड़ी ले के परमाणु बम्ब

ख़ौफ़ फैला फ़िज़ां में जिधर देखिए

लोग हाथों में पत्थर लिए हैं खड़े

कब तलक बच रहेगा  सर,  देखिए


विश्व में हो अमन, चैन हो, प्रेम हो

बुद्ध के सीख- संदेश गाते चलें ।

आज दीपावली,ज्योति का पर्व है। दीप की मालिका हम सजाते चलें। 


-आनन्द.पाठक-


शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2021

ग़ज़ल 198

 122---122---122----122


ग़ज़ल 198

तेरे इश्क़ में इब्तिदा से हूँ राहिल

न तू बेख़बर है, न मैं हीं हूँ ग़ाफ़िल


ये उल्फ़त की राहें न होती हैं आसाँ

अभी और आएँगे मुश्किल मराहिल


मुहब्ब्त के दर्या में कागज की कश्ती

ये दर्या वो दर्या है जिसका न साहिल


जो पूछा कि होतीं क्या उलफ़त की रस्में

दिया रख गई वो हवा के मुक़ाबिल


इबादत में मेरे कहीं कुछ कमी थी

वगरना वो क्या थे कि होते न हासिल


अलग बात है वो न आए उतर कर

दुआओं में मेरे रहे वो भी शामिल


कभी दिल की बातें भी ’आनन’ सुना कर

यही तेरा रहबर, यही तेरा आदिल ।


-आनन्द. पाठक-


राहिल = यात्री