मंगलवार, 30 मार्च 2021

ग़ज़ल 161


1222---1222---1222----1222

मुफ़ाईलुन—मुफ़ाईलुन—मुफ़ाईलुन—मुफ़ाईलुन

बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम

 

एक ग़ज़ल होली पर

 

न उतरे ज़िन्दगी भर जोलगा दो रंग होली में,

हँसीं दुनिया नज़र आए , पिला दो भंग होली में ।         

 

न उतरी है न उतरेगीतुम्हारे प्यार की रंगत,

वही इक रंग सच्चा हैन हो बदरंग  होली में ।--          

 

कहीं ’राधा’ छुपी  फिरतीकहीं हैं गोपियाँ हँसतीं,

चली कान्हा कि जब टोलीकरे हुड़दंग होली में ।      

 

’परे हट जा’-कहें राधा-’कन्हैया छोड़ दे रस्ता’

“न कर मुझसे यूँ बरज़ोरीनहीं कर तंग होली में” ।    

 

गुलालों के उड़ें बादलजहाँ रंगों की बरसातें,

वहीं अल्हड़ जवानी के फड़कते अंग होली में ।         

 

थिरकती है कहीं गोरीमचलता है किसी का दिल

बजे डफली मजीरा हैंबजाते चंग होली में ।             

 

सजा कर अल्पना देखूँतुम्हारी राह मैं ’आनन’

चले आओ, मैं नाचूँगीतुम्हारे संग होली  में ।            

 

-आनन्द,पाठक-

 

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