शनिवार, 27 मार्च 2021

ग़ज़ल 22

 फ़ऊलुन---फ़ऊलुन--फ़ऊलुन--फ़ऊलुन

122----------122------122--------122
बह्र-ए-मुतक़रिब मुसम्मन सालिम
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ग़ज़ल

मुहब्बत की जादू-बयानी न होती
अगर तेरी मेरी कहानी न होती

न "राधा" से पहले कोई नाम आता
अगर कोई ’मीरा" दिवानी न होती

ये राज़-ए-मुहब्बत न होता नुमायां
जो बहकी हमारी जवानी न होती

हमें दीन-ओ-ईमां से क्या लेना-देना
बला जो अगर आसमानी न होती

उमीदों से आगे उमीदें न गर हो
तो हर साँस में ज़िन्दगानी न होती

कोई बात तो उन के दिल पे लगी है
ख़ुदाया ! मेरी लन्तरानी न होती

रकीबों की बातों में आता न गर वो
तो ’आनन’ उसे बदगुमानी न होती

-आनन्द.पाठक

नुमायां = ज़ाहिर होना
लन्तरानी = झूटी शेखी /डींग मारना
[सं 20-05-18]

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