रविवार, 28 मार्च 2021

ग़ज़ल 77

 


कहाँ तक रोकता दिल को कि जब होता दिवाना है
ज़माने  से    बगावत   है ,  नया आलम  बसाना है

मशालें   इल्म की  लेकर  चले थे  रोशनी करने
जो अबतक ख़्वाब में खोए ,उन्हे तुम को जगाना है 

यूँ जिनके शह पे कल तुमने एलान-ए-जंग तो कर दी 
कि उनका एक ही मक़सद ,तुम्हें  मोहरा बनाना है

धुँआ  आँगन से उठता है तो अपना दम भी घुटता है
तुम्हारा शौक़ है या साज़िशों  का ताना-बाना  है

लगा कर आग नफ़रत की सियासी रोटियाँ  सेंको
अरे ! क्या हो गया तुमको जो अपना घर जलाना है

-" शहीदों की चिताऒं पर लगेंगे  हर बरस मेले "-
यहाँ की धूल पावन है , तिलक माथे लगाना है

तुम्हारे बाज़ुओं में  दम है कितना ,जानता ’ आनन’
हमारे बाजुओं  का ज़ोर अब तुमको  दिखाना है 

-आनन्द.पाठक-

[सं 30-06-19]

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