शुक्रवार, 11 जून 2021

ग़ज़ल 175

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ग़ज़ल 175


लोग हद से गुज़रने लगे हैं
आइने देख डरने लगे हैं

हम तो मक़्रूज़ है ज़िन्दगी के 
दर्द से क़िस्त भरने लगे हैं

घाव जो वक़्त ने भर दिए थे
जख़्म फिर से उभरने लगे हैं

झूठ के जो तरफ़दार थे,वो
बात सतयुग की करने लगे हैं

बारहा ज़िन्दगी को समेटा
और सपने बिखरने लगे हैं

शौक़ से वो क़लम बेच आए
पूछने पर, मुकरने लगे हैं

जुर्म किसका था,इलजाम ’आनन’
सर पर मेरे वो धरने लगे हैं


-आनन्द.पाठक-


मक्रूज़ = ऋणी 


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