शनिवार, 17 सितंबर 2022

ग़ज़ल 265

 


ग़ज़ल 265(30E)

2122---2122--212


उनकी इशरत शादमानी और है

मेरे ज़ख़्मों की निशानी और है


उनकी ग़ज़लें और ही कुछ कह रहीं 

आइने की तर्ज़ुमानी और है


जो पढ़ा इतिहास क्या है सच वही

वक़्त की अपनी कहानी और है


रोटियों की बात पर ख़ामोश हैं

झूठ की जादूबयानी और है


बात वैसे आप की तो ठीक है

दिल की लेकिन हक़-बयानी और है


जर्द पत्ते शाख़ से टूटे हुए

दर बदर की ज़िंदगानी और है


नींद क्यों तुमको अभी आने लगी 

दास्तां सुननी सुनानी और है

 

आप ’आनन’ से कभी मिलिए ज़रा

शौक़ मेरा, मेज़बानी और है।


-आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ

हक़बयानी - सच्ची बात




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