रविवार, 27 अगस्त 2023

अनुभूतियाँ 118/05

 क़िस्त 118/क़िस्त 5

 

 

469

आ अब लौट चले मेरे दिल !

यादों की भूली बस्ती में

जहाँ उन्हे छेड़ा करते थे

अपनी धुन में मस्ती मे

 

470

 

निश-दिन याद करूँगा तुम को

हक़ है मेरा उन यादों पर

जाने अनजाने जो किया था

मुझे भरोसा उन वादों पर

 

471

छोड़ गई तुमख़ुशी तुहारी

लेकिन याद तुम्हारी बाक़ी

तुम्हे मुबारक नई ज़िंदगी

मुझको रहने दो एकाकी

 

472

शाम ढलेगी गोधूली में

सब चरवाहें घर जाएंगे

हमको भी तो जाना होगा

कितने दिन तक रह पाएँगे


 

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