रविवार, 25 फ़रवरी 2024

ग़ज़ल 316

  ग़ज़ल 316[81]

212---212---212----212

सच से उस का कोई वास्ता भी नहीं,

क्या हक़ीक़त उसे जानना  भी नहीं ।


उँगलियाँ वो उठाता है सब की तरफ़

और अपनी तरफ़ देखता भी नहीं ।


रंग चेहरे क्यों उड़ गया आप का ,

सामने तो कोई आइना भी नहीं ।


पीठ अपनी सदा थपथपाते रहे ,

क्या कहें तुमको कोई हया भी नहीं ।


टाँग यूँ ही अड़ाते रहोगे अगर ,

तुम को देगा कोई रास्ता भी नहीं ।


आप दाढ़ी मे क्या लग गए खोजने ,

मैने 'तिनका' अभी तो कहा भी नहीं ।


रेवड़ी बाँटने  ख़ुद  चले आप थे

किसको क्या क्या दिया कुछ पता ही नहीं


राज-सत्ता भी ’आनन’ अजब चीज़ है

मिल गई , तो कोई छोड़ता भी नहीं


-आनन्द पाठक-

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