मंगलवार, 27 फ़रवरी 2024

ग़ज़ल 339

 


ग़ज़ल 339/14

212---212---212---212--


तुम ने जैसा कहा मैने वैसा किया

फ़िर बताओ कि मैने बुरा क्या किया ?


हाथ की बस लकीरें रहे देखते

बाजुओं पर न तुमने भरोसा किया ।


ध्यान में वह नहीं था, कोई और था

बस दिखावे का ही तुमने सज्दा किया ।


इश्क़ क्या चीज़ है, तुमको क्या है पता

इश्क़ के नाम पर बस तमाशा किया ।


रह-ए-हक़ में क़दम दो क़दम क्या चले

चन्द लोगों ने मुझ से किनारा किया ।


क्यों जुबाँ लड़खड़ाने लगी आप की

आप ने कौन सा सच से वादा किया ।


बात ’आनन’ की चुभने लगी आप को

सच की जानिब जब उसने इशारा किया ।


-आनन्द.पाठक--


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें