मंगलवार, 30 मार्च 2021

ग़ज़ल 148

 ह्र - मुतदारिक मुसम्मन सालिम मुज़ाअफ़ 

फ़ाइलुन ---[8-बार ]
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ग़ज़ल 148 : ज़िन्दगी ना हमारी हुई आजतक ---

ज़िन्दगी ना हमारी हुई आजतक ,और हम ना  कभी ज़िन्दगी के हुए     ,
अपनी शर्तों पे जीते रहे उम्र भर ,दिल को इस में ख़ुशी थी, ख़ुशी के हुए ।

धूप मुट्ठी में कब बाँध पाया कोई ,जो कि तुम अब चले हो इसे बाँधने   ,
इस भरम में रहे मुबतिला उम्र भर ,गुमरही में रहे  बेदिली  के हुए  ।

झूठ की राह में सच मिलेगा नहीं ,और सच से तुम्हें वास्ता भी नहीं ,
तुम तमाशा दिखाते रहे बारहा और हम थे कि क़ायल उसी के हुए  ।

’आप’ लाने को सूरज गए थे कभी ,हाथ में एक परचम नया जोश था ,
राह में ’एक कुरसी दिखी ’आप’ को  ,छोड़ कर रोशनी ,तीरगी के हुए ।

हैं बहारें ,फ़िज़ाएँ ,चमन और भी ,रोशनी के मनाज़िर नए और भी ,
तुम अँधेरों से यारी निभाते रहे ,लाख चाहा ,न तुम रोशनी के हुए  ।

आलम-ए-खाक दिल रहा अजनबी ,हम भटकते रहे बस इधर से उधर ,
इक जज़ा की तमन्ना रही साथ में ,रफ़्ता रफ़्ता रह-ए-आगही के हुए    ।

तुम में ’आनन’ यही बस बुरी बात है ,राह चलते कहीं जो कोई मिल गया  ,
कुछ भी देखा नहीं ,कुछ भी जाना नहीं ,प्यार से जो मिला तुम उसी के हुए  ।



आनन्द.पाठक-

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