मंगलवार, 30 मार्च 2021

ग़ज़ल 149

 ह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम

मफ़ाइलुन--मफ़ाइलुन--मफ़ाइलुन--मफ़ाइलुन
1222-------1222------1222-----1222
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मुहब्बत जाग उठी दिल में ,ख़ुदा की यह इनायत है ,
इसे रुस्वा नहीं करते ,अक़ीदत है , इबादत है    ।

जफ़ा वो कर रहें मुझ पर ,दुआ भी कर रहें मेरी ,
ख़ुदा जाने इरादा क्या ,ये नफ़रत है कि उल्फ़त है ?

मरासिम ही  निभाने हैं ’हलो’ या ’हाय’ ही कह कर ,
अगर वाज़िब समझते हो ,हमें फिर क्या शिकायत है ।

ज़माने की हवाओं से  मुतस्सिर हो गए तुम भी ,
न अब वो गरमियाँ बाक़ी न पहली सी रफ़ाक़त है । 

कहाँ ले कर मैं जाऊँगा  ,ये अपना ग़म तुम्हीं कह दो ,
तुम्हारा दर ही काबा है ,यही अपनी ज़ियारत है  ।  

रकीबों के इशारों पर ,नज़र क्यों फेर ली तुम ने?
हमीं से पूछ लेते  तुम -’ कहो ! क्या क्या शिकायत है ?’ 

इधर मैं जाँ ब लब ’आनन’ उधर वो रंग-ए-महफ़िल में ,
यही हासिल मुहब्बत का , हसीनों की  रवायत है  ।   

-आनन्द.पाठक-


मरासिम - रस्में
मुतासिर = प्रभावित
रफ़ाक़त =दोस्ती
जाँ ब लब = मरणासन्न स्थिति

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