मंगलवार, 27 फ़रवरी 2024

ग़ज़ल 336

  ग़ज़ल 336/11


212---212---212---212


इश्क़ क्या है? न मुझको बताया करो

जो पढ़ी हो, अमल में भी लाया  करो  ।


गर ज़ुबाँ से हो कहने में दुशवारियाँ

तो निगाहों से ही कह के जाया करो ।


जो रवायत ज़माने के नाक़िस हुए

छोड़ दो, कुछ नया आज़माया करो ।


दोस्ती भी इबादत से तो कम नही

बेगरज़ साथ तुम भी निभाया करो ।


रहबरी है तुम्हारी कि साज़िश है कुछ

जानते हैं सभी , मत छुपाया करो ।


जो अँधेरों में है उनके दिल में कभी

इल्म की रोशनी तो जगाया करो ।


नाम ’आनन’ का तुमने सुना ही सुना

जानना हो तो घर पे भी आया करो ।


-आनन्द पाठक--


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