शुक्रवार, 1 मार्च 2024

ग़ज़ल 344

  

ग़ज़ल 344 [19]


1212---1122---1212---112


मैं दूर जा के भी उसको कभी भुला न सका

करीब था तो कभी हाल-ए-दिल सुना न सका


तमाम उम्र इसी  इन्तिज़ार में गुज़री,

गया था कह के, मगर लौट कर वो आ न सका ।


हर एक दौर में थीं साज़िशें मिटाने की

करम ख़ुदा का था कोई हमें मिटा न सका ।


ख़याल-ए-ख़ाम थे अकसर जगे रहे मुझमें

मैं चाह कर भी नज़र आप से मिला न सका ।


बना के ख़ाक से फिर ख़ाक में मिलाए क्यों

ये खेल आप का मुझको समझ में आ न सका


जिधर है दैर-ओ-हरम, है उधर ही मयख़ाना

किधर की राह सही है कोई बता न सका ।


तेरी तलाश में ’आनन’ कहाँ कहाँ न गया 

मुक़ाम क्या था? कहाँ था ? कभी मैं पा न सका ।


-आनन्द.पाठक--


 

ग़ज़ल 343

  



ग़ज़ल 343[18]


221---2122  // 221---2122


आकर जो पूछ लेते, क्या हाल है हमारा ?

ताउम्र दिल ये करता ,सद शुक्रिया तुम्हारा ।


किस शोख़ से अदा से, नाज़ुक़ सी उँगलियों से

तुमने छुआ था मुझको, दहका बदन था सारा ।


होती अगर न तेरी रहम-ओ-करम, इनायत

तूफ़ाँ में कश्तियों को मिलता कहाँ किनारा !


दैर-ओ-हरम की राहें , मैं बीच में खड़ा हूँ

साक़ी ने मैकदे से हँस कर मुझे पुकारा ।


दिलकश भरा नज़ारा, मंज़र भी ख़ुशनुमा हो

जिसमें न अक्स तेरा ,किस काम का नज़ारा ।


जब साँस डूबती थी, देखी झलक तुम्हारी

गोया की डूबते को तिनके का हो सहारा ।


मैं ख़ुद में गुम हुआ हूँ , ख़ुद को ही ढूंढता हूँ

मुद्दत हुई अब आनन’, ख़ुद को नहीं निहारा !


-आनन्द.पाठक---


ग़ज़ल 342

 


ग़ज़ल 342


2122---2122---2122


यार के कूचे में जाना कब मना है !

दर पे उसके सर झुकाना कब मना है !


मंज़िलें तो ख़ुद नहीं आएँगी  चल कर

रास्ता अपना बनाना कब मना है !


प्यास चातक की भला कब बुझ सकी है

तिशनगी लब पर सजाना कब मना है !


रोकती हों जो हवाओं रोशनी को-

उन दीवारों को गिराना कम मना है !


ज़िंदगी बोझिल, सफ़र भारी लगे तो

प्यार के नग्में सुनाना कब मना है !


ज़िंदगी है तो सदा ग़म साथ होंगे

पर ख़ुशी के गीत गाना कब मना है !


जो अभी हैं इश्क़ में नौ-मश्क ’आनन’

हौसला उनका बढ़ाना कब मना है !


-आनन्द.पाठक-


ग़ज़ल 341

  ग़ज़ल 341


212---212---212---212


तेरी गलियों में जब से हैं जाने लगे

जिस्म से रूह तक मुस्कराने लगे


दूर से जब नज़र आ गया बुतकदा

घर तुम्हारा समझ  सर झुकाने लगे


इश्क़ दर्या है जिसका किनारा नही

यह समझने में मुझको ज़माने लगे


देखने वाला ही जब न बाकी रहा

किसकी आमद में खुद को सजाने लगे


ये ज़रूरी नहीं सब ज़ुबां ही कहे

दर्द आँखों से भी कुछ बताने लगे


तुमने मुझको न समझा न जाना कभी

दूसरों के कहे में तुम आने लगे ।


राह-ए-हक़ से तुम ”आनन’ न गुज़रे कभी

इसलिए सब हक़ीक़त फ़साने लगे ।


-आनन्द.पाठक-

मंगलवार, 27 फ़रवरी 2024

ग़ज़ल 340

  ग़ज़ल  340[15]


२१२---२१२---२१२---२१२


क्यों अँधेरों में जीते हो मरते हो तुम

रोशनी की नहीं बात करते हो तुम


रंग चेहरे का उड़ता क़दम हर क़दम

सच की गलियों से जब भी गुज़रते हो तुम


कौन तुम पर भरोसा करे ? क्यों करे?

जब कि हर बात से ही मुकरते हो तुम


राह सच की अलग, झूठ की है अलग

राह ए हक  पर भला कब ठहरते हो तुम ?


वो बड़े लोग हैं, उनकी दुनिया अलग

बेसबब क्यों नकल उनकी करते हो तुम ?


वक़्त आने पे लेना कड़ा फ़ैसला

उनके तेवर से काहे को डरते हो तुम ?


तुमको उड़ना था ’आनन; नहीं उड़ सके

तो परिंदो के पर क्यों कतरते हो तुम ?


-- आनन्द,पाठक--