शुक्रवार, 12 जुलाई 2024

ग़ज़ल 388

 ग़ज़ल 388[52F]

2122---2122---212


वह धुआँ फ़ैला रहा है बेसबब

राग अपना गा रहा है बेसबब


सच उसे स्वीकार करना ही नहीं

झूठ पर इतरा रहा है बेसबब


आँख में पानी नहीं फिर क्यों उसे

आइना दिखला रहा है बेसबब


वह ’खटाखट’ क्या तुम्हें देगा कभी

वह तुम्हे भरमा रहा है बेसबब ।


अब सयानी हो गईं है मछलियां

जाल क्यों फ़ैला रहा है बेसबब । 


काम उसका ऊँची ऊँची फेंकना

बात में क्यों आ रहा है बेसबब ।


अब तो ’आनन’ तू उन्हें पहचान ले

क्यों तू धोखा खा रहा है बेसबब ।


-आनन्द.पाठक-

सं 01-07-24



ग़ज़ल 387

  

ग़ज़ल 387 [51F]

2122---2122---2122


आश्रमों में धुंध का वातावरण है

बंद आँखें फिर भी कहते जागरण है ।


आदमी अंदर ही अंदर खोखला है

खोखली श्रद्धा का ऊपर आवरण है ।


और को उपदेश देते त्याग माया 

कर न पाते मोह का ख़ुद संवरण है ।


लोग अंधी दौड़ में शामिल हुए अब 

चेतना का क्या नया यह अवतरण है ।


भीड़ में हम भेड़ -सा हाँके गए हैं

यह निजी संवेदना का अपहरण है ।


ख़ुद से आगे और कुछ दिखता न उनकॊ

स्वार्थ का कैसा भयंकर आचरण है ।


रोशनी स्वीकार वो करते न ’आनन’

इन अँधेरों का अलग ही व्याकरण है ।


-आनन्द.पाठक-

सं 01-07-24


ग़ज़ल 386

  ग़ज़ल 386[50F]

1222---1222---1222---1222


खुदा की जब इनायत हो बहार-ए-हुस्न आती है।

अगर दिल पाक हो तो फिर मुहब्बत ख़ुद बुलाती है ।


जुनून-ए-इश्क़ में फिरते, ख़िज़ाँ क्या है , बहारां क्या

फ़ना होना ही बस हासिल, यही दुनिया बताती है ।


नवाज़िश आप की साहिब !बहुत मश्कूर है यह दिल

मेरी  मक़रूज़ है हस्ती ,ज़ुबाँ देकर निभाती  है ।


लगा करती हैं जब जब ठोकरें, आँखें खुला करती

यही ठोकर सदा इन्सान को रस्ता दिखाती है ।


कहाँ आसान होता है गली तक यार की जाना

जो जाती है कभी यह ज़िंदगी कब लौट पाती है 


हवाएं साजिशें रचतीं चिरागों कॊ बुझाने की

 जो लौ  जलती जिगर के खून से, कब ख़ौफ़ खाती है 


अजब उलफ़त की नदिया है, अजब इसका सिफ़त ’आनन’ 

नहीं चढ़ना, नही चढ़ती, चढ़ी तो रुक न पाती है ।


-आनन्द.पाठक-

सं 01-07-24


ग़ज़ल 385

  ग़ज़ल 385[49F]

221---2121---1221---212


औरों की तरह "हाँ’ मे मैने "हाँ’ नहीं कहा

शायद इसीलिए मुझे पागल समझ लिया ।


लफ़्ज़ों के ख़ल्त-मल्त से  कुछ इस तरह कहा

जुमलों में जैसे फिर से नया रंग भर दिया ।


उसके तमाम झूठ थे तारीफ़ की मिसाल

मेरे तमाम सच को वो ख़ारिज़ ही कर दिया 


 वह आँख बन्द कर के कभी ध्यान में रमा

कुछ बुदबुदाया, भीड़ ने ’मन्तर’-समझ लिया।


गूँगी जमात की उसे जब बस्तियाँ दिखीं ,

 हर बार वह चुनाव में पहले वहीं  गया ।


’दिल्ली’  में जा के जब कभी गद्दीनशीं हुआ

घर के ही कोयले में  ’ज़वाहिर’ उसे दिखा  ।


कितनी अज़ीब बात थी सब लोग चुप रहे

’आनन’ ग़रीब था तो सरेआम लुट गया ।


-आनन्द.पाठक-

ख़ल्त-मत = फेट-फ़ाट , गड्म-गड्ड

सं 01-07-24


ग़ज़ल 384

 ग़ज़ल 384[48F]

2122---1212---22


ज़िंदगी! और क्या सुनाना है 
कर्ज़ तेरा हमे चुकाना है ।

ज़िंदगी दूर दूर ही रहती
पास अपने उसे बिठाना है ।

उनके आने की क्या ख़बरआई
फिर मिला जीने का बहाना है ।

बात दैर-ओ-हरम की क्या उनसे
जिनको उस राह पर न जाना है ।

रंग ऐसा चढ़ा नहीं उतरा
जानता क्या नहीं जमाना है

इन तक़ारीर के सबब क्या हैं
राज़ ही जब नही बताना  है ।

जो अँधेरों में अब तलक बैठे
उनके दिल में दिया जलाना है ।

बेसबब क्यों भटक रहा ’आनन’
दिल में ही उसका जब ठिकाना है ?

-आनन्द.पाठक-

सं 01-07-24
तक़ारीर =प्रवचन