शुक्रवार, 12 जुलाई 2024

ग़ज़ल 393

  ग़ज़ल 393[ 56F]

212---212---212---212


वह ’खटाखट’ खटाखट’ बता कर गया

हाथ में पर्चियाँ मैं लिए हूँ खड़ा ।


बेच कर के वो सपने चला भी गया

सामना रोज सच से मै करता रहा  ।


उसने जो भी कहा मैने माना ही क्यों

वह तो जुमला था जुमले में क्या था रखा।


आप रिश्तों को सीढ़ी समझते रहे

मैं समझता रहा प्यार का रास्ता ।


झूठ की थी लड़ाई बड़े झूठ से 

’सच’- चुनावो से पहले ही मारा गया ।


अब सियासत भी वैसी कहाँ रह गई

बदजुबानी की चलने लगी जब  हवा ।


उसकी बातों में ’आनन’ कहाँ फ़ँस गए

आशना वह कभी ना किसी का हुआ  ।


-आनन्द.पाठक- 

सं 02-07-24


ग़ज़ल 392

  ग़ज़ल 392[55F]

1212---1212---1212---1212

ह्ज़ज मक़्बूज़ मुसम्मन


सफ़र शुरु हुआ नहीं कि लुट गया है क़ाफ़िला

जहाँ से हम शुरु हुए, वहीं पे ख़त्म  सिलसिला ।


दो-चार ईंट क्या हिली कि हो गया भरम उसे

इसी मुगालते में है किसी का ढह गया किला ।


वो झूठ पे सवार हो उड़ा किया इधर उधर

वो सत्य से बचा किया, रहा बना के फ़ासिला।


तमाम उम्र वह अना की क़ैद में जिया किया

वह चाह कर भी ख़ुद कभी न ज़िंदगी से ही मिला।


इसी उमीद में रहा बहार लौट आएगी

कभी न ख़त्म हो सका मेरे ग़मों का सिलसिला ।


मिला कभी तो यूँ मिला कि जैसे हम हो अजनबी

कभी गले नहीं मिला, न दिल ही खोल कर मिला ।


रहा खयाल-ओ-ख़्वाब में वो सामने न आ सका

अब ’आनन’-ए-हक़ीर को रहा नहीं कोई गिला ।


-आनन्द.पाठक-

सं 01-07-24

ग़ज़ल 391

  ग़ज़ल 391[54F]

2122---212 // 2122--212

रमल मुरब्ब: महज़ूफ़ मुज़ाइफ़


कह गया था वह मगर लौट कर आया नही

बाद उसके फिर मुझे, और कुछ भाया नहीं ।


चाहता था वह कि मैं ’हाँ’ में ’हाँ’ करता रहूँ

राग दरबारी कभी , गीत मैं गाया नहीं ।


बदगुमानी में रहा इस तरह वह आदमी

क्या ग़लत है क्या सही, फ़र्क़ कर पाया नहीं।


ज़िंदगी की दौड़ में सब यहाँ मसरूफ़ हैं

कुछ को हासिल मंज़िलें, कुछ के सर साया नहीं।


इश्क़ होता भी नहीं ,आजमाने के लिए 

चल पड़ा तो चल पड़ा, फ़िर वो रुक पाया नहीं।


सब उसी की चाल थी और हम थे बेख़बर

वह पस-ए-पर्दा रहा, सामने आया नहीं ।


तुम भी ’आनन’ आ गए किसकी मीठी बात में

साज़िशन वह आदमी किसको भरमाया नहीं ।


-आनन्द.पाठक-

सं 01-07-24

ग़ज़ल 390

  ग़ज़ल 390

221---1221---1221---122
[ बह्र--ए-मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ मह्ज़ूफ़]
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गर बन न सका फ़ूल तो काँटा न बना कर
चलते हुए राही को न बेबात चुभा कर ।

मत भूल तुझे लौट के आना है धरा पर
उड़ता है गगन में भले जितना भी उड़ा कर ।

क्या कह रही है प्यार की बहती हुई नदी
’रोको न रवानी को मेरी बाँध बना कर ।

झुकने को तो झुक जायेगा दुर्गम यह हिमालय
चलना है अगर चल तो नई राह बना कर ।

वैसे तो मेरे दिल में है इक प्यार का दर्या
गाता है मुहब्बत का सदा गीत, सुना कर ।

किस रूप में मिल जाएगा इन्सां में फ़रिश्ता
यह सोच के इनसान का आदाब किया कर।

बालू का घरौंदा है, नही घर तेरा 'आनन' 
यह जिस्म है फानी, तू इसे घर न  कहा कर ।


-आनन्द.पाठक-

ग़ज़ल 389

 ग़ज़ल 389[53F

221---2121---1221---212


हम बेनवा कि जब से हिमायत में लग गए

कुछ लोग ख़्वाहमख़्वाह शिकायत में लग गए ।


जब तोड़ने चला था पुरानी रवायतें ,

कुछ क़ौम के अमीर हिदायत में लग गए ।


जब मग़रबी हवाएँ कभी गाँव आ गईं

तह्ज़ीब-ओ- तरबियत की हिफ़ाज़त में लग गए ।


जो कुछ जमीर थी बची, उसको भी बेच कर

सुनते हैं आजकल वो सियासत में लग गए ।


जो सर कटा लिए थे वो गुमनाम ही रहे ,

नाख़ून कुछ कटा के शहादत में लग गए ।


दुनिया को बार बार खटकते रहे है, हम

क्यों इश्क़ की तवाफ़-ओ-इबादत में लग गए ।


’आनन’ अजीब हाल है लोगों का आजकल

करना था जिन्हे प्यार , अदावत में लग गए ।


-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ 

बेनवा = बेकस ग़रीब मजलूम

अमीर = समाज के ठेकेदार

मग़रिबी हवाएँ = पाश्चात्य संकृति की हवाएँ
तहज़ीब-ओ-तर्बियत = संस्कार
तवाफ़-ओ-इबादत = परिक्रमा और पूजा 

सं 01-07-24