शुक्रवार, 11 जून 2021

ग़ज़ल 178

 ग़ज़ल 178

21--21-121--122 // 21-121-121-122


अपना ही क्यों हरदम गाते, तुम भी सोचो, मैं भी सोचूँ . 
कैसे  कैसे स्वाँग रचाते , तुम भी सोचो, मैं भी सोचूँ . 

बात यक़ीनन कुछ तो होगी, मतलब होगा उनका,वरना
क्यों क़ातिल का साथ निभाते?, तुम भी सोचो, मैं भी सोचूँ . 

चोट लगी हो जब शब्दों से, जीवन भर वो रिसते रहते
घाव कहाँ कब हैं भर पाते? तुम भी सोचो, मैं भी सोचूँ . 

इतने तो मासूम नहीं हो, जान रही है दुनिया सारी
फिर तुम क्यों खुद को झुठलाते? तुम भी सोचो, मैं भी सोचूँ 

चाँद सितारों की बातों से ,मुझको क्या है लेना-देना
क्या सच है यह क्यों न बताते? तुम भी सोचो, मैं भी सोचूँ . 

फ़ित्ना उभरा, बस्ती उजड़ी, लोग मगर ख़ामोश रहे क्यूँ
हम सब क्यों गूँगे हो जाते ? तुम भी सोचो, मैं भी सोचूँ . 

माया की ही सब माया है, जान रहे हो तुम भी ’आनन’
दलदल में क्यों फँसते जाते ? तुम भी सोचो, मैं भी सोचूँ . 


-आनन्द.पाठक-


ग़ज़ल 177

 ग़ज़ल 177

221--1222 //221-1222


हर बात पे नुक़्ताचीं ,उनकी तो ये आदत है
हम ग़ौर से सुनते हैं,अपनी ये ज़हानत है


अच्छा न बुरा कोई ,सब वक़्त के मारे हैं
तकदीर अलग सब की.सब रब की इनायत है


सब लोग सफ़र में हैं, फिर लौट के कब आना
चलना ही जहाँ चलना ,कैसी ये मसाफ़त है ?


पर्दे में अज़ल से वो , देखा भी नहीं  हमने
हर शै में नज़र आता ,जब दिल में सदाकत है


वीरान पड़ा है दिल, मुद्दत भी हुई अब तो
आता न इधर कोई, करने कोअयादत है


क्यों पूछ रही हो तुम ’आनन’ का पता क्या है?
क्या कोई सितम बाक़ी,क्या कोई क़यामत है ?


”आनन’ की जमा पूँजी , बाक़ी है बची अबतक
इक चीज़ है ख़ुद्दारी ,इक चीज़ शराफ़त है 



-आनन्द.पाठक


मसाफ़त = सफ़र

अज़ल से = अनादि काल से

सदाक़त = सच्चाई

इयादत = मरीज का हाल चाल पूछना


ग़ज़ल 176

 ग़ज़ल 176

21--121--121--122// 21-121-121-12

अहमक लोगो को कुर्सी पर, बैठे अकसर देखा है
पूरब जाना,पश्चिम जाए , ऐसा रहबर देखा है

तेरा भी घर शीशे का है, मेरा भी घर शीशे का
लेकिन तेरे ही हाथों में, मैने पत्थर  देखा  है 

नफ़रत की जब आँधी चलती, छप्पर तक उड़ जाते हैं
गुलशन, बस्ती, माँग उजड़ती .ऐसा मंज़र देखा है 

मंज़िल से ख़ुद ही ग़ाफ़िल है ,बातें ऊँची फेंक रहा
बाहर से मीठा मीठा है , भीतर ख़ंजर देखा है 

एक ’अना’ लेकर ज़िन्दा है ,झूठी शान दिखावे की
दुनिया में उसने अपने से , सबको कमतर देखा है

बच्चे वापस आ जायेंगे,ढूँढ रहीं बूढ़ी आँखें
ग़म में डूबे खोए बाबा. ऐसा भी घर देखा है 

लाख शिकायत जीवन तुम से ,फिर भी कुछ है याराना
जब भी देखा मैने तुमको, एक नज़र भर देखा है

नाम सुना होगा ’आनन’ का. शायद देखा भी होगा
लेकिन क्या  ’आनन’ का तुम ने, ग़म का सागर देखा है?


अहमक - नाक़ाबिल. 

ग़ज़ल 175

 212---212---212--2


ग़ज़ल 175


लोग हद से गुज़रने लगे हैं
आइने देख डरने लगे हैं

हम तो मक़्रूज़ है ज़िन्दगी के 
दर्द से क़िस्त भरने लगे हैं

घाव जो वक़्त ने भर दिए थे
जख़्म फिर से उभरने लगे हैं

झूठ के जो तरफ़दार थे,वो
बात सतयुग की करने लगे हैं

बारहा ज़िन्दगी को समेटा
और सपने बिखरने लगे हैं

शौक़ से वो क़लम बेच आए
पूछने पर, मुकरने लगे हैं

जुर्म किसका था,इलजाम ’आनन’
सर पर मेरे वो धरने लगे हैं


-आनन्द.पाठक-


मक्रूज़ = ऋणी 


अनुभूतियाँ 64

 
253
वादा करना शौक़ तुम्हारा
और निभाना जब हो मुश्किल
झूठे वादे क्यॊ करती हो
राह देखता रहता है दिल
 
254
पल दो पल का मिलना क्या था
जीवन भर का दर्द मिला है
बेहतर होता ना ही मिलते
जब मिलने का यही सिला है
 
255
साथ छोड़ कर यूँ जाने की
क्यों इतनी जल्दी थी जानम!
जीवन भर की बात हुई थी
साथ निभाने को थी हमदम!
 
256
मेरे प्रश्नों का कब उत्तर
देती हो तुम मन से खुलकर
’हाँ, में ’ना” में या चुप हो कर
शब्द प्रकम्पित अधर पटल पर

-आनन्द.पाठक-