सोमवार, 21 जून 2021

अनुभूतियाँ 68


269
मौसम आते मौसम जाते
और हवाओं की सरगोशी
कह देती हैं सारी बाते
एक तेरी लम्बी ख़ामोशी
 
270
इतना भी आसान नहीं है
बरसों का है साथ -भुलाना
भूल भले ही तुम जाओ,पर
मुझको है ताउम्र  निभाना
 
271
किसकी चिन्ता ,कैसी चिन्ता ?
दिल को रोना ,रो के रहेगा
टाल सका है कौन यहाँ कब
होना है जो हो के रहेगा
 
272
गया वक़्त फिर कब आता है
यादें रह जाती हैं मन में
कागज की थी नाव कभी, पर
बहुत भरोसा था बचपन में

-आनन्द.पाठक-

अनुभूतियाँ 67

 

क़िस्त 67

 
265
सफ़र ख़तम होने वाला है
राह आख़िरी की तैयारी
बहुत शुक्रिया साथी मेरे !
बहुत निभाई तुम ने यारी
 
266
नया सफ़र हो तुम्हे मुबारक
साथी तुमको मिला नया है
जितना साथ रही तुम,काफी
मेरी छोड़ो मेरा क्या  है !
 
267
होली का मौसम आया है,
फ़गुनह्टा’ आँचल सरकाए।
मादक हुई हवाएँ, प्रियतम !
रह रह कर है मन भटकाए ।

268
कुछ रही शिकायत तुम से भी
कुछ पपने ग़म का रोना था
दुनिया को मैं क्या बतलाता
जो होना था, वो होना था

-आनन्द.पाठक-

अनुभूतियाँ 66

 

क़िस्त  66

261
नकली चेहरे  वाले करते
दिल्ली का सत्ता संचालन
नकली सिक्के कर देते हैं
असली सिक्कों का निष्कासन


262
अहम भरा है नस नस उनके
औरों को छोटा समझे वो
अपना सिक्का असली समझें
ग़ैरों का खोटा समझे वो
 
263
हर मौज़ू पर इल्म बाँटते
अपने को बरतर आँके वो
बात अमल की जब आती है
इधर उधर बगलें झाँके वो
 
264
कुएँ का मेढक क्या समझे
उसकी तो बस उतनी दुनिया
उछल रहा है ऐसे मानों
नाप के आया कोई दर्या

-आनन्द.पाठक-

अनुभूतियाँ 65

 

क़िस्त 65


257
प्यार भरी बातें करनी थी
लेकिन वह भी मौसम बीता
कल तक दिल में सौ बातें थीं
आज वही घट रीता रीता
 
258
उन बातों की बात न करनी
सुन कर दिल हो जाए भारी
और किसी दिन मिल बैठेंगे
सुन लेंगे फिर व्यथा तुम्हारी

259
माया की सब ये माया है
दलदल में तुम फ़ँसते जाते
ऐसा क्यों है तुम भी सोचो
फिर भी हम सब हँसते जाते

260
स्वांग रचाए तुमने कितने
फिर भी खुद को ना चल पाए
सच का केवल एक रूप है
झूठ कहाँ कब तक चल पाए

-आनन्द.पाठक-

शुक्रवार, 11 जून 2021

गीत 70

 2122---2122--2122--2122

गीत 70 : ज़िन्दगी से लड़ रहा हूँ ---

ज़िन्दगी से लड़ रहा हूँ ,मैं अभी हारा नहीं हूँ ,
बिन लड़े ही हार मानूँ ? यह नहीं स्वीकार मुझकॊ

जो कहेंगे वो, लिखूँ मैं ,शर्त मेरी लेखनी पर,
और मेरे ओठ पर ताला लगाना चाहते हैं ।
जो सुनाएँ वो सुनूँ मैं, ’हाँ’ में ’हाँ’ उनकी मिलाऊँ
बादलों के पंख पर वो घर बनाना चाहते हैं॥

स्वर्ण-मुद्रा थाल लेकर आ गए वो द्वार मेरे,
बेच दूँ मैं लेखनी यह ? है सतत धिक्कार मुझको

ज़िन्दगी आसां नहीं तुम सोच कर जितनी चली हो,
कौन सीधी राह चल कर पा गया अपन ठिकाना ।
हर क़दम, हर मोड़ पर अब राह में रहजन खड़े हैं
यह सफ़र यूँ ही चलेगा, ख़ुद ही बचना  या बचाना ।

जानता हूँ  तुम नहीं मानोगी  मेरी बात कोई-
और तुम को रोक लूँ मैं, यह नहीं अधिकार मुझको।

लोग अन्दर से जलें हैं, ज्यों हलाहल से बुझे हों,
आइने में वक़्त के ख़ुद को नहीं पहचानते हैं।
नम्रता की क्यों कमी है, क्यों ”अहम’ इतना भरा है
सामने वाले को वो अपने से कमतर मानते हैं।

एक ढूँढो, सौ मिलेंगे हर शहर में, हर गली में ,
रूप बदले हर जगह मिलते वही हर बार मुझको।

-आनन्द.पाठक-