मंगलवार, 3 अगस्त 2021

अनुभूतियाँ 70

 क़िस्त 70

277

बात यहाँ की, या कि वहाँ की

बातों में तू शामिल होगा

साँस बाँध कर दौड़ रहा है 

सोच ज़रा क्या हासिल होगा ?


278

नदिया अविरल बहती रहती

नहीं देखती पीछे मुड़ कर

एक कल्पना में जीती है

आनन्दित सागर से जुड़ कर 


279

बात नई वैसे तो नहीं कुछ

पीड़ा है जानी पहचानी

पास जो बैठो,कह लें,सुन लें

अपनी अपनी राम कहानी


280

हाथ मिलाना, मिल कर रहना

कोई मुश्किल काम नहीं है

लेकिन अहं गुरुर आप का

बन जाती दीवार वहीं है 

-आनन्द.पाठक-


अनुभूतियाँ 69

 क़िस्त 69


273
साथ सफ़र में कितने आए
धीरे-धीरे दूर हो गए
हम सब हैं कठपुतली उसकी
नर्तन को मजबूर हो गए ।


274
सावन फिर आने वाला है
और अभी तक तुम हो रूठी
"हाँ" कह कर फिर भी ना आना
क्यॊं न कहूँ मैं तुम हो झूठी


275
"मेघदूत" का नहीं जमाना
जो कहना है ’मेसेज’ कर दो
और कोई इल्जाम हो बाक़ी
वह भी मेरे सर पर धर दो


276
जब तुमने यह मान लिया है
मैं ही ग़लत था,तुम ही सही थी
तिल का तुमने ताड़ बनाया
बात जो मैने कही नहीं थी

-आनन्द.पाठक-

सोमवार, 2 अगस्त 2021

ग़ज़ल 191

 2122---1212--112

ग़ज़ल 191 : चाह अपनी छुपा न सके--


चाह अपनी कभी छुपा न सके
बात दिल की ज़ुबाँ पे ला न सके

आँख उनकी कही न भर आए
ज़ख़्म दिल का उन्हे दिखा न सके

सामने यक ब यक जो आए वो
शर्म से हम नज़र मिला न  सके

कैसे करता यक़ीन मैं तुम पर
एक वादा तो तुम निभा न सके

ज़िन्दगी के हसीन पहलू को
एक हम हैं कि आजमा न सके

लोग इलजाम धर गए मुझ पर
हम सफ़ाई में कुछ बता न सके

याद क्या हम को आ गया ’आनन’
हम नदामत से आँख उठा न सके 

-आनन्द पाठक-

ग़ज़ल 190

 221--1222 // 221--1222


ग़ज़ल 190


बगुलों की मछलियों से, साजिश में रफ़ाक़त है
कश्ती को डुबाने की, साहिल की  इशारत  है

वो हाथ मिलाता है, रिश्तों को जगा कर के
ख़ंज़र भी चुभाता है , यह कैसी शरारत है

शीरी है ज़ुबां उसकी , क्या दिल में, ख़ुदा जाने 
हर बात में नुक़्ता चीं ,उसकी तो ये आदत है

जब दर्द उठा करता, दिल तोड़ के अन्दर से
इक बूँद भी आँसू की कह देती हिकायत है

इकरार नहीं करते ,’हां’ भी तो नहीं कहते
दिल तोड़ने वालों से, क्या क्या न शिकायत है

अब कोई नहीं मेरा, सब नाम के रिश्ते हैं
हस्ती से मेरी अपनी ताउम्र बग़ावत है

इक राह नहीं तो क्या ,सौ राह तेरे आगे
चलना है तुझे ’आनन’ कोई न रिआयत है

=आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ

रफ़ाक़त = दोस्ती, सहभागिता

हिकायत = कथा-कहानी ,वृतान्त

रिआयत = छूट 



ग़ज़ल 189

 1222---1222----1222----1222

ग़ज़ल 189

जो रंग अस्ल है वो दिखाएगा एक दिन

वो सरफ़िरा है होश में आएगा  एक दिन


नफ़रत के शह्र में भरा बारूद का धुआँ

पैग़ाम-ए-इश्क़ कोई सुनायेगा एक दिन


कुछ लोग हैं कि अम्न के दुश्मन बने हुए

यह वक़्त उनको खुद ही मिटाएगा एक दिन


किस बात पर गुरूर है ,किस बात का नशा

सब कुछ यहीं तू छोड़ के जाएगा एक दिन


हम तो इसी उमीद में करते रहे वफ़ा

वह भी वफ़ा का फ़र्ज़ निभाएगा एक दिन


वैसे हज़ार बार वो इनकार कर चुका

आने को कह गया है तो आएगा एक दिन


’आनन’ उमीद रख अभी आदम के हुनर पर

सूरज उतार कर यही लाएगा एक दिन


-आनन्द,पाठक-