रविवार, 4 अप्रैल 2021

ग़ज़ल 166

 ग़ज़ल 166

2122---1212---22



सर्द रिश्तों को  ढूँढ कर रखना
अपने लोगों की भी ख़बर रखना

आसमाँ पर नज़र तो रखते हो
इस ज़मीं पर भी तुम  नज़र रखना

इश्क में पेच-ओ-ख़म हज़ारों हैं
सोच कर ही क़दम इधर रखना

लोग टूटे हुए हैं अन्दर से -
दिल से दिल साथ जोड़ कर रखना

जख़्म जैसे छुपाते रहते हो
ग़म छुपाने का भी हुनर रखना

पूछ लेना ज़मीर-ओ-ग़ैरत से
पाँव पर जब किसी के, सर रखना

ज़िन्दगी का सफ़र सहल होगा
 मो’तबर एक हम सफ़र  रखना

किसको फ़ुरसत ,तुम्हें सुने ’आनन’
बात रखना तो मुख्तसर रखना 

-आनन्द,पाठक- 

ग़ज़ल 165

122---122----122---122
फ़ऊलुन--फ़ऊलुन--फ़ऊलुन-फ़ऊलुन
बह्र-ए-्मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम

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ग़ज़ल 165

दुआ कर मुझे इक नज़र देखते हैं
वो अपनी दुआ का असर देखते हैं

ज़माने से उसको बहुत है शिकायत
हम आँखों में उसकी शरर देखते हैं

सदाक़त, दियानत की बातें किताबी
इधर लोग बस माल-ओ-ज़र देखते हैं

वो कागज़ पे मुर्दे को ज़िन्दा दिखा दे
हम उसका कमाल-ए-हुनर देखते हैं

दिखाता हूँ अपना जो ज़ख़्म-ए-जिगर तो
खुदा जाने किसको किधर देखते हैं

कहाँ तक हमें खींच लाई है हस्ती
अभी कितना बाक़ी सफ़र देखते हैं

सभी को तू अपना समझता है ’आनन’
तुझे लोग कब इस नज़र देखते हैं ।


-आनन्द.पाठक-


शनिवार, 3 अप्रैल 2021

अनुभूतियाँ 63

 
1
इतना भी आसान नहीं है
बरसों का है साथ -भुलाना
भूल भले ही तुम जाओ,पर
मुझको है ताउम्र  निभाना
 
2
किसकी चिन्ता ,कैसी चिन्ता ?
दिल को रोना ,रो के रहेगा
टाल सका है कौन यहाँ कब
होना है जो हो के रहेगा
 
3
गया वक़्त फिर कब आता है
यादें रह जाती हैं मन में
कागज की थी नाव कभी, पर
बहुत भरोसा था बचपन में
 
4
साथ सफ़र में कितने आए
धीरे-धीरे दूर हो गए
हम सब हैं कठपुतली उसकी
नर्तन को मजबूर हो गए ।  

-आनन्द.पाठक-

 

 

अनुभूतियाँ 62

 
1
भूलूँ भी तो भूलूँ कैसे ,
तुम्ही बता दो क्या करना है
मर मर कर हर पल जीना या
जी जी कर हर पल मरना है ?
 2
मैं हूँ मेरी क़लम हाथ में
और साथ में तनहाई है
महकी महकी याद तुम्हारी
जाने क्या कहने आई है ?
 3
अगर कभी लिखने भी बैठूँ
बीती बातों के अफ़साने
सिर्फ़ तुम्हारी जानिब से ही
भर जाएँगे सभी बहाने
 4
अलग हो गई राह तुम्हारी
नज़र तुम्हारी बदल गई अब
मैने तो स्वीकार कर लिया
दिल को यह स्वीकार हुआ कब ?

-आनन्द.पाठक-

 

अनुभूतियाँ 61


1
सुबह सुबह ही उठ कर तुम ने
बेपरवा जब ली अँगड़ाई
टूट गया दरपन शरमा कर
खुद से जब तुम खुद शरमाई
 
2
मजबूरी क्या क्या न तुम्हारी
जान रहा हूँ, मैं भी जानम !
क़दम तुम्हारे बँधे हुए थे .
आती भी तो कैसे, हमदम !
 
3
आज अचानक याद तुम्हारी
मलय गन्ध सी जब आई है
सोए सपने जाग उठे सब
सपनों नें ली अँगड़ाई  है
 
4
शाम इधर होने को आई
तुम अपना सामान उठा लो
अगर ग़लत कुछ हुआ कभी हो
दीवानापन समझ भुला दो
-आनन्द.पाठक-